पूज्यपाद सन्त - शिशु सूर्यजी महाराज

पूज्यपाद सन्त - शिशु सूर्यजी महाराज

स्व0 दरबारी प्र्र्र्रसाद यादव के सुपुत्र सन्त शिशु सूर्यजी महाराज का अवतरण लगभग 1920 ई0 मे मधेपुरा जिलान्तर्गत रवापुर (रतवारा) नामक ग्राम  मे हुआ था। 1 जुलाई 1997 ई0 को आप परलोक सिधार गये। आपकी माता स्व0 युवा देवी थी। 20 वर्श की अवस्था मे आपका विवाह नवादा (नवगछिया) ग्राम मे श्रीमती कटोरिया देवी से हुआ था, जिनसे दो पुत्रियाॅं हुई - श्रीमती निर्मला देवी और श्रीमती षान्ति देवी ।
पूज्य सन्त षिषु सूर्यजी महाराज अपने माता-पिता के एकमात्र पुत्र थे तथा उनकी दो बहनें थी। इनकी एक बहन स्व0 देषरत्न देवी के सुपुत्र बिहारीलाल दासजी महात्मा हैं, जो महर्षि मेँहीँ जन्म भूमि मझुआ आश्रम मे रहते है। दूसरी बहन स्व0 जयवन्ती देवी भी सन्तमत से दीक्षित थी।
पूज्य बाबा को जब पहली बार वैराग्य हुआ तो सन्1944 ई0 के जून महीने मे अपने द्यर का परित्याग कर दिया और सन्तमत सत्संग-आश्रम, सिकलीगढ़ धरहरा आये और 4 दिनो तक वहाॅं रहकर पुनःद्यर वापस चले गये । फिर भजन-भेद लेने की अभिलाशा से दूसरी बार धरहरा आये, लेकिन गुरु महाराज से मुलाकात नहीं हो सकी। तब आप श्रीधर बाबा के आदेष से 13 दिनो तक आश्रम की सेवा करके द्यर लौट गये। 6 फरवरी 1945 ई0 मे महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज नवगछिया पधारे थे। पूज्य सन्त शिशु बाबा ने महर्षिजी के प्रवचन से प्रभावित होकर भजन-भेद लिया और उसी समय से ब्रह्मचर्य-व्रत धारण कर द्यर पर ही साधना करने लगे। आपने स्कूल मे षिक्षा प्राप्त नहीं  की थी, लेकिन स्वप्रयास से पढ़ना-लिखना जान गये थे।
पूज्य सन्त शिशु बाबा प्रायः सभी सन्तों की वाणी के पाठ के माध्यम से सत्संग-प्रचार किया करते थे। आपको गुरु-मुख द्वारा कहे गये प्रमुख वचन तिथि सहित याद थे। आपने इसी स्मरण-षक्ति के आधार पर गुरु-वाणी के कई बैनर  बनवाये और विभित्र सत्संग आश्रमों मे लगवाये थे। इन बैनरो के माध्यम से कम पढ़े-लिखे लोग भी गुरुदेव द्वारा प्रदत ज्ञान का सार ग्रहण कर  पाते हैं। आप स्वयं गुरुदेव के प्रवचनो का पाठ करते और अपने सेवको को भी पाठ करने को प्रेरित करते थे। आपको गुरु महाराज मे अटूट श्रद्वा और अगाध विश्वास था आपका कथन था कि ‘‘सन्तों से अधिक कोई कुछ नही कह सकता। इसलिए सन्तो की वाणी का पाठ करो, समझो और लोगो को समझाओ । इस तरह करोगे तो गरूइेव की अजरत्र कृपा-वर्शा तुम पर होगी। ’’ इस प्रकार आप गरू महाराज के ज्ञान का प्रसाद वितरित करते रहते थे।
आपमें अहंकार नाममात्र को नहीं था। सन्तमत के हित- चिन्तक के रूप मे आपको हमेषा याद किया जायेगा। आपने जीवन-भर सन्तमत की बहुत सेवा की लेकिन प्रायः आप यही कहते रहे कि ‘‘सन्तमत का मैंने न कुछ किया हैं, न कर रहा  हॅं सबकुछ अज्ञात कृपा से हो रहा हैं।’’
गुरूमहाराज के साथ एक बार आप एक मंच पर विराजमान थे। गुरू महाराज ने आपको पूछा कि ‘‘ सन्त शिशु ! ‘मोह मुद्गर’ से षंकराचार्य का पद याद है, जो सत्संग-योग मे संकलित है?’’ इस पर आपने कहा, ‘‘नही सरकार!’’ तब आप गुरूमहाराज बोले, ‘‘क्यों याद नही हैं मंच पर बैठे हो, जाओ नीचे बैठो।’’ तब आप सत्संगियो के बीच जा बैठे और फिर कभी मंच पर आसीन नही हुए। सबों को आदर देना आपका स्वभाव था। वस्तुतः महात्माओं का श्रृंगार तो यही है कि ‘‘सबै मान प्रद आपु अमानी ’’, सबको सम्मान देते है, लेकिन स्वयं मान नहीं चाहते। गरू महाराज के सिद्धात व आदेशों का आप अक्षरषः पालन करते थे।
पूज्य सन्त षिषु सूर्यजी महाराज का पितृगृह मधेपुरा जिलान्तर्गत खापुर (वाया आलम नगर, पोस्ट किषनपुर रतबारा) नामक ग्राम है। इनके पिता एक ईमानदार व्यक्ति थे, जो कृशि-कार्य से जीविकोपार्जन करते थे पूज्य शिशु बाबा ने अपने पारिवारिक दायित्वों (दोनो पुत्रियो के विवाह) का निर्वाह करने के बाद सन् 1952 ई0 मे गृह-त्याग करके महर्षि मेँहीँ जन्मभूमि मझुआ में एक फूस की कुटी बना ली और वहीं निवास करने लगे। आप प्रायः गरूदेव के सत्संग मे भाग लेते रहते थे। गरूदेव ने एक बार पूछने की कृपा की कि कहाँ रहते हो ? इस पर आपने कहा, ‘‘सरकार की जन्मभूमि  महुआ मे रहता हूॅं। ’’ तब गुरूदेव बोले-‘‘यहाँ क्या खाओगे ?’’ पूज्य बाबा बोले- ‘‘सरकार ! आपका ही कथन है कि जो सत्संग-भजन करता रहेगा, उसे मोटे अत्र और मोटे अत्र का अभाव नहीं होगा।’’ गरूदेव ने अभयदान दिया- ‘‘ठिक है जब ऐसी निश्ठा है, तो अवश्य सबकुछ मिलेगा।’’
     सन् 1968 ई0 मे गुरूदेव ने 22 व्यक्तियो को भजन-भेद देने का आदेष दिया। इन 22 व्यक्तियो मे आपका नाम भी था। दीक्षा का अधिकार मिलने पर भी आप लोगों को दीक्षा नही देते थे। इसपर गुरू महाराज ने एक दिन आपसे पूछा कि दीक्षा क्यो नहीं देतें देते हो? शिशु बाबा बोले, ‘‘सरकार ! आपके सत्संग-योग में वर्णित गुरू की योग्यता मुझमे नही है इसीलिए भजन-भेद बताता हूॅं। ’’ तब गुरू महाराज बोले , ‘‘ तुम हमारी बात नहीं मान कर लोगो को पास बराबर भेज देते हो। मैं कहता हूॅं कि मिर्च तीखा ही होता है; कोई भी देगा तो खाने तीखा ही लगेगा। इस तरह मेरा आदेश तुम्हारे साथ है। मै बताऊँ या तुम बताऊँ; जो करेगा वह अवष्य प्राप्त करेगा।’’ गरूदेव के इन वचनो को आज्ञा मानकर आपने शिरोधार्य किया और लोगों को दीक्षा देने लगे। इससे स्पष्ट होता है कि पूज्य सन्त शिशु बाबा सच्चे अर्थो मे साधु और कर्तव्यनिश्ठ महात्मा थे।
एक बार आप भारत के प्रथम राश्ट्रपति डाॅ0 राजेन्दª प्रसाद को सद्गुरू महाराज के सन्तमत-सत्संग से अवगत कराने की इच्छा लेकर दिल्ली गये थे। लेकिन उनसे  मुलाकात नही हो सकी और आप वापस लौट आये। आपने एक पत्र राजेन्दª बाबु के नाम भेजा, जिसमें आपने खेद प्रकट करते हुए लिखा कि यात्रा की कितनी परेषानी के बाद मिलने की इच्छा लेकर दिल्ली पहुँचाने पर भी आपसे मिलने का संयोग न बन सका और निराष होकर लौटना पड़ा। जिसको देश के एक नागरिक से मिलने समय नही है, उनसे धर्म के कार्य में सहयोग की आषा करना व्यर्थ ही है। स्वनामधन्य राजेन्दª बाबु के निजी सचिव का पत्रोतर तत्काल आ पहुँचा, जिसमें लिखा गया था कि महामहिम राश्ट्रपतिजी को देष-कार्य को अनेक व्यस्तताएँ रहती है। इन व्यस्तताएॅं में अचानक समय निकाल पाना अक्सर कठिन होता है। अतः खेद न करे; अवसर मिलने पर आपसे अवष्य मुलाकात होगा।
इस पत्र को आपने पूज्य गुरूदेव को दिखाया । गुरूदेव बोले, ‘‘तुम बड़े-बड़े लोगो में प्रचार करने का खयाल रखते हो। यदि तुम मेरे साथ कुछ दिन रहो तो सब ज्ञान हो जायेगा और ठीक से प्रचार कार्य कर सकोगे। जैसे आम के वृक्ष में लगे हुए फल परिपक्व होने तक वृक्ष में ही लगे रहते हैं, तो उस फल में नवीन वृक्ष पैदा करने की षक्ति आ जाती है और जो फल परिपक्व होने के पहले ही गिर जाता है तो उसकी चटनी बन जाती है। जब पूरा ज्ञान प्राप्त हो जाय तो गुरू से अलग होकर भी प्रचार कार्य सफलतापूर्वक कर सकते हो!’’
एक बार महाराज ने आपसे कहा कि तुम बेटी-जमाई के चक्कर में नही रहना, नही तो गिर जाओगे। गुरूदेव के कहने का आषय था। कि वैरागी होकर परिवार से स्नेह रखना-साधुत को क्षति पहुॅंचाना है। 
गुरू महाराज के निवास से कोसो दूर रहकर भी सन्तमत के अद्वितीय सेवक सन्त षिषु सूर्यजी महाराज उनके बहुत निकट रह। उनका उज्जवल जीवन-चरित सन्तमत की आगमी पीढि़यो के लिए अनुकरणीय बना रहेगा।