पूज्यपाद स्वामी श्रीविश्णुकान्तजी महाराज

पूज्यपाद स्वामी श्रीविश्णुकान्तजी महाराज

जन्म-स्थान, जन्म-तिथि एवं माता-पिताः महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज  के वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध शिष्य स्वामी श्रीविष्णुकान्त झाजी का जन्म अररिया जिलान्तर्गत परिहारी (वाया मेरीगंज) नामक ग्राम में सन् 1925 ई0 में हुआ था। आपके पिता स्वर्गीय राधाकान्त झा एवं माता स्वर्गीय भुवनेश्वरी देवी सनातन-धर्म की अनुयायी एवं धर्मनिशष्ठ दम्पति थे। यो तो ब्राह्मण लोग धर्मावतार माने जाते है; शायद इसी दृष्टि से महर्षिजी भी आपको आदर और सम्मान देते थे।
भाई-बहन व शिक्षा आप भाईयो में सबसे छोटे है। आपके बड़े भाई श्रीकृष्णकान्त झाजी सन्तमत के पुरानी सत्संगी है। इन्हीं के सुपु़त्र स्वामी श्रीकृष्णकान्त झाजी सन्तमत के योग्य प्रचारक हैं। आपकी तीन बहने भी थी। लेकिन तीनो बहनें गायत्री देवी, विन्ध्यवासिनी देवी तथा परमेष्वर देवी क्रमशः दिवंगता हो गई। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा गाॅंव के स्कूल में ही हुई और सन्1942 ई0 में आपने संस्कृत विद्यालय से मध्यमा की परिक्षा पास की। माता-पिता की तरह ही आपने भी बाल्यकाल से ही रामचरितमानस, गीता तथा अन्य सद्ग्रन्थों का पाठ और पूजन आदि किया करते थे। धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवारों को समाज में आदर और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है; यही सम्मान और आदर आपके परिवार को प्राप्त था। स्वामीजी का पूरा परिवार वैष्णव और सनातनधर्मी था। गो0 तुलसीदासजी ने अपनेरामचरितमानस में लिखा हैः

पूजिय विप्र सील गुन हीना ।
                           सूदª न गुन गन ज्ञान प्रवीन ।।
इसका अर्थ महर्शिजी ने इस प्रकार किया है कि षील-गुण से हीन ब्राह्माणों को भी पूजा करनी चाहिए, क्योंकि ज्ञान-गुण में निपुण छोटा नहीं होता।
आध्यात्मिक जीवनः एक बार की बात है कि महर्शिजी का किसी जगह सत्संग होने जा रहा था। उसमें महर्शिजी के प्रवचनों को सुनने के लिए बहुत सारे लोग इकट्ठे हुए थे, उसमें आप भी उपस्थित थे। महर्शिजी ने रामचरितमानस की निम्नांकित चैपाई की विषद व्याख्या कीः

  बन्दौं रामनाम रद्युवर को।

हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।
इस व्याख्या को सुनकर आपके मन में महर्शिजी के प्रति श्रद्धा उत्पत्र  हुई और सन्तमत के प्रति जगा। आपने महर्शिजी से षिश्यत्व प्राप्त करने की बात सोचने लगे। ऐसे सन्तो का दर्शन बड़ा दुर्लभ होता है। आप सन्् 1948 ई0 में महर्षि मेंहीं आश्रम, सिकलीगढ़ धरहरा आये महर्शिजी से दीक्षा लेकर पूरी तन्मयता के साथ साधन-भजन करने लगे।
साधन में बढ़ती अभिरूचि के कारण आपने एकान्त में कटी बनवा ली और अपना अधिकांष समय सत्संग-ध्यान मे ही लगाने लगे। 1950 ई0 में आराधदेव ने आपको मनिहारी आश्रम बुलाया और पूछा कि पाठ करना जानते है? आपके पास पूर्वजन्म का संस्कार तो था। ही, फिर भी पाठ में जो  कुछ त्रुटियाॅं थी। उसका परिमार्जन गुरूदेव के संरक्षण में रहकर आपने कर लिया। 1961 ई0 से आप गुरू महाराज के साथ सत्संग में पाठ करने लगे। सन् 1964 ई0 में सन्तमत-सत्संग के प्रचार -प्रसार हेतु पूज्यपाद श्रीशाही स्वामीजी  महाराज की अध्यक्षता में एक 1966 ई0 में आपको महर्षिजी ने प्रसत्रतार्वक संन्यास-वस्त्र प्रदान किया था। महशिजी ने पहली बार जिन पाॅंच प्रमुख महात्माओं को दीक्षा देने का आदेष दिया था, उनमें पूज्य श्री श्रीधर दासजी महाराज, पूज्य पाद श्रीषाही स्वामीजी महाराज पूज्य श्रीलच्छन बाबा, स्वामी श्रीगंगाराम ठाकुर के साथ स्वामी विश्णुकान्त झाजी भी सम्मिलित थे। आपने तभी से गुरू-आज्ञा का पालन करते हुए लगभग 12,000 लोगो को दीक्षित किया। गुरू महाराज आपको अखिल भारतीय सत्संग तथा जिलाधिवेषनों में अवष्य बुलाते थे और आप से ही सत्संग-योग, वेद-दर्षन-योग, धम्मपद् आदि सद्ग्रन्थों का पाठ करवाते थे;क्योकि  आप सत्संग के सभी कार्यक्रमों में जाते थे;किन्तु, वृद्धावस्था के कारण अब बाहर के कार्यक्रमों में षमिल हो पाना आपके लिए कठिन हो गया हैं। आप मुख्य रूप से  साप्ताहिक तथा त्रिदिवसीय सत्संग किया करते है। आपका प्रवचन पाठ पर आधारित सरल तथा बोधगम्य होता है। आपने परिहारी में सन्तमत सत्संग मन्दिर का निर्माण किया है। और स्वयं रानीगंज मन्दिर में रहा करते है। महर्शिजी के प्रमुख षिश्यो में आपका नाम आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है।
रामेष्वर दासजी की प्रथम पत्नी एक पुत्री को जन्म देने के कुछ वर्षो के  बाद स्वर्ग सिधार गई। परिवारजनों के बहुत आग्रह पर आपने दूसरा विवाह सहरसा जिले के चन्दाभिता के निवास श्री ढोढ़ाय मण्डलजी की सुपुत्री तेतरी कुमारी के साथ किया। द्वितीय पत्नी से आपको एक पुत्री और दो पुत्र प्राप्त हुए। पत्नी का कुछ वर्शो के बाद देहान्त गया। ज्येश्ठ पुत्र का नाम नन्दलाल मण्डल और छोटे का नाम ब्रह्मदेव मण्डल है। आर्थिक दशा खराब होने के कारण दिन-भर हल-कुदाल चलाना, बैलगाड़ी, जोतना, खेतो की रखवाली करना आपकी जीवनचर्या बन गई थी। ऐसे कर्मठ और कर्मशाील जीवन में भी आपने भजन-साधन में कभी कमी नहीं होने दी। रातभर सन्तवाणी रटते और ध्यानाभ्यास में लीन रहते।
सन् 1934 ई0 में महात्माजी ने बकिया भवानी पुर में नादानुन्धान की क्रिया परमाराध्य गुरूदेव से प्राप्त की। 4 फरवरी 1942 ई0 को ईष्वर के प्रति पूर्ण आस्था हुई। संसार से तीव्र वैराग्य हुआ। तभी आपने द्यर-परिवार का सम्पूर्ण दायित्व पुत्रो को सौंपकर अपना सारा समय सत्संग-भजन में बिताने लगे। सन् 1970 ई0 में पूज्य श्रीषाही स्वामीजी महाराज ने गरूदेव की अन्तः प्रेरणा से महात्मा ने जिन 30-31 साधकों को भजन-भेद दिया था, उनमें  रामेष्वर दासजी भी एक है। अब तक 5,000 लोग इनसे दीक्षा लेकर साधन में रत हैं।
आपका विषाल हदय,निश्कपट, निराग्रही और करूणा से ओतप्रोत है। आपके उज्जवल चरित्र पर कलुश की कभी छाया नहीं पड़ी । आपका जीवन  सादगी, विनम्रता और षिश्टता का मूर्तिमान रूप है। आजीवन कर्मठ बने रहने वाले महात्मा श्रीरामेष्वर दासजी कभी किसी के मुखापोक्षी नहीं रहे। अपने परिश्रम से अर्जित 17 बीद्ये जमीन आपके पास थी। आपने अपनी सुपुत्री द्वारा दान की हुई 2 बीद्ये 4 कट्े की जमीन पर सत्संगियो के सहयोग से एक भव्य और विशाल महर्षि मेंहीं  सन्तमत सत्संग-आश्रम के निर्माण कोदराद्याट में किया और वहीं निवास करते हुए आप ध्यान-भजन किया करते थे। आप एक कुषल वक्ता भी थे। सन्तवाणियो पर आधारित आपके प्रवचन खड़ी बोली हिन्दी में होता था, जिससे श्रोतागण बहुत प्रभावित होते थे। लोगो ने तीन बार आपको समाधि की अवस्था बार तीव्र ज्वर से। आपका सम्पूर्ण जीवन त्याग,तपस्या,साधना और भक्ति को समर्पित था। आपके द्वारा रचित साहित्यिक कृति ‘सद्गुरू की खोज’ ‘सन्त सन्देष’ और ‘सन्त-पन्थ’ से बहुत सारे साधक लाभान्वित हो रहे है। सन् 1933 ई0 में आपने अपने पार्थिव षरीर को त्याग दिया और परलोकवासी हो गये।