पूज्यपाद स्वामी श्रीरामेष्वर दासजी महाराज

पूज्यपाद स्वामी श्रीरामेष्वर दासजी महाराज

 सद्गुरू महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज के गण्यमान्य संन्यासी षिश्यो में महात्मा श्रीरामेष्वर दासजी महाराज का नाम श्रद्धा के साथ लिया जाता है। आपका निवास-स्थान मधेपुरा मण्डलान्तर्गत रतवारा थाने का कोदराद्याट नामक ग्राम ळें गंगोत्री कुलोत्पत्र आपके पूज्य पिता श्रीकाषी दासजी भागलपुर मण्डलान्तर्गत बिहपुर थाने के षाहपुर नामक गाॅंव के पूर्व निवासी थे। श्रीकाषी दासजी के तीन  पुत्र और दो पुत्रियाॅं थी। बड़े पुत्र जहोरी दास, मॅंझले सिंहेष्वर दास तथा कनिश्ठ पुत्र महात्मा जी स्वयं थे। श्रीकाषी दासजी गंगा के दक्षिण तट पर अवस्थित गंगापुर दियारे में बटाईदारी मे खेती किया करते थे। जब महात्मा जी के पिता गंगापुर में बासा बनाकर रहते थे।  उस समय महात्माजी  और उनके बड़े भाई वहीं रहते थे। बड़े भाई खेती मे पिताजी की मदद करते थे तथा महात्माजी गाय चराया करते थे। इनके बड़े भाई साल भर पहले सन्तमत में दीक्षित हो चुके थे। बड़े भाई की संगति में आप भी सत्संग में जाने लगे। इस तरह सत्संग का प्रभाव इन पर पड़ा और 31 दिसम्बर 1927  ई0 को बैकुण्ठपुर दियारे में  पूज्य महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज  से आपने दीक्षा प्राप्त की और निश्ठापूर्वक ध्यानाभ्यास करने लगे।

महात्माजी का जन्मकाल सन् 1903 ई0 के लगभग है। ये अनपढ़ थे। इन्होने मुरौतवासी श्री बजरंगी गुरूजी से, जो सिकलीगढ़ धरहरा आश्रम में संन्यासी के रूप में रहतें थे। नागरी लिपि सीखी । तब से जोड़-जोड़कर पढ़ते-पढ़ते अच्छी तरह पढ़ने लगे। बचपन मे पहाड़े लिखने के पूर्व पाॅंच बार ये भगवान् का नाम लिया करतेथे। किषोरावस्था में ही इनके मानस में बहुत से आध्यात्मिक प्रष्न उठने लगे थे, जिनमें सर्वप्रमुख था कि ‘‘मैं कौन हूॅं? ’’ गाॅंव के बाहर सुनसान मैदान में अकेले आॅंख बन्द  करके बैठे रहने में आपको बड़ा आनन्द मिलता था। आॅंख बन्द करने पर आपको प्रकाष और चित्र-विचित्र दृष्य दीख पड़ते थे। दीक्षा लेने के बाद तो दृश्टियोग में आपको विषेश आन्दानुभूति होने लगी। इनके दो विवाह हुए थे। पहला विवाह 12   वर्ष  की अवस्था में भागलपुर जिले के गंगापुर गाॅंव के निवासी श्री झुप्पड़ मण्डल की सुपुत्री मन्ती कुमारी के साथ हुआ था।  विवाह के वक्त आपने विरोध नहीं किया। साधु-महात्मा न अनुकूलता का स्वागत करते हैं और न प्रतिकूलता का तिरस्कार ही। प्रभु-कृपा से जैसी स्थिति आती हैं उसी में अपने को समायोजित कर लेते हैं। रामकृश्ण परमहंसी महाराज ने अपने विवाह की चर्चा चलाये जाने पर विरोध प्रकट नहीं किया था, बल्कि स्वयं अभिभावको को बताया था कि अमुक गाॅंव में कन्या मिल जायेगी। हुआ भी ठीक ऐसा ही।

मन को पढ़ लिया और द्यर पर ही दो बीद्या खेत आपको देकर उनमें बाॅंस और केले के वृक्षों का रोपण कर दिया। फिर आप स्वावलम्बी जीवन व्यतीत करते हुए, अक्षर ज्ञान लेकर, साधना-भजन के साथ -साथ सन्त साहित्य का अध्ययन भी करने लगे। एक दिन आप सन्त कबीर साहब की वाणी का पाठ कर रहे थे, उसमे शब्द-साधना सम्बन्धी चर्चा थी। उसे पढ़कर आपने मन में शब्द-भेद देने की प्रार्थना करने लगे। गरूदेव ने आपको सहर्श षब्दयोग की क्रिया बता दी और कहा, ‘‘दृश्टि स्थिर होने पर ऊपर से जो षब्द सुनाई पड़ता है, उस ओर मन को लगाओ । अगर दिृष्टि स्थिर नही हुई है तो दाहिनी ओर से जो शब्द आ रहा है, उस ओर मन को लगाओ।’’
शब्द -साधना की दीक्षा लेकर आप मचहा आ गये शब्द -अभ्यास करने  लगे। 1955 ई0 के आसपास गुरूदेव ने मचहा आश्रम में आपको संन्यास वस्त्र दिया था। यहीं रहकर आप सत्संग का प्रचार-प्रसार किया करते थे। आपको प्रवचन में अनुभूत तथ्यो का समावेश होता था, जिससे सत्संगी जन मन्त्रमुग्ध हो जाते थे। आज भी सत्संगीगण आपका बड़े प्रेम और आदर से लेते हैं।
12 अप्रैल, 1996 ई0 को पूज्य बाबा श्रीमोती दासजी महाराज अपने जीवन  के 84 वर्ष पूरे किये और परलोक सिधार गये। पूज्य बाबा  महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज के आज्ञाकारी शिष्य थे। महर्शिजी के शिष्यो में आपको प्रमुख स्थान प्राप्त है। साधुता में आप अग्रगण्य थे। आपके जीवन के अन्तिम क्षण तक आपके परमप्रिय सेवक साधुजी ने आपकी सेवा प्रेमपूर्वक की थी।