श्री हरिनंदन दास जी महाराज

पूज्यपाद स्वामी श्रीहरिनन्दन दासजी महराज

भारत-भूमि का बिहार राज्य अपनी विशिष्टताओंें के कारण अत्यन्त गौरवशाली है। बिहार के मिथिलांचल को इसका श्रेय जाता है। पूर्वकाल से ही मिथिलांचल सन्त-महात्माओं एवं बड़े-बड़े विद्वानों की तपस्या-भूमि तथा उनका कार्य-क्षेत्र रहा है। इसी मिथिलांचल के कोशी प्रक्षेत्र मेंसुपौल जिले के त्रिवेणीगंज प्रखण्डान्तर्गत ’मनहाद्ध नाम की एक सघन आबादीवाली बस्ती है। सद्गुरू महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज के सेवक शिष्य स्वामी श्रीहरिनन्दन दासजी महाराज का जन्म इसी ग्राम में चैत्र शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को सन् 1935 ई0 को हुआ था। यदुकुलभूषण स्व0 कैलू प्रसाद यादवजी इनके सौभाग्यशाली पिता थे। स्वर्गीय सुखिया देवी इनकी पूजनीया माताजी थीं। आपके पिताजी बहुत ही सात्त्विक विचार, सरल स्वभाव एवं षान्त प्रकृति के धर्मात्मा व्यक्ति थे। आपकी पूजनीया माताजी भी बहुत ही षुद्ध, सरल एवं कोमल स्वभाव की परम साध्वी भक्तिमती महिला थीं। माता-पिता की छाया में उनके सदाचरण का सुप्रभाव आपके मन पर पड़ा, जिसने आपको अन्य बालकों से भिन्न तथा भगवद्भक्तिपरायण बना दिया। बालपन में पड़ोस के बच्चों के साथ खेलते हुए रामानन्दी सम्प्रदाय के महात्माओं को देखकर आप भी उन्हीं की तरह वेष बनाकर पूजन किया करते थे। घर पर बहुत ही पवित्रता तथा श्रद्धा के साथ खेलते हुए रामानन्दी सम्प्रदाय के महात्माओं को देखकर आप भी उन्हीं की तरह वेष बनाकर पूजन किया करते थे। घर पर बहुत ही पवित्रता तथा आप देवी-देवताओं की पूजा देर तक किया करते थे। आप दो भाई तथा आपकी तीन बहनें हैं। बडे़ भाई स्व0 दरोगीप्रसाद यादव थे 

शिक्षा एवं आध्यात्मिक जीवन: उस समय आपके गाँव में पढे़-लिखे लागांे की संख्या बहुत कम थी। माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ने-लिखने को विशेष रूप से प्रेरित नहीं करते थे। आपके पिताजी ने भी आपको विद्यालय जाने और पढ़ने के लिए नहीं कहा। लेकिन दूसरे बच्चों को स्कूल जाता देख आपने स्वयं ही विद्यालय जाने की इच्छा प्रकट की और पिताजी की आज्ञा लेकर स्कूल जाने लगे। पढने में आपका बहुत मन लगता था पाठय-पुस्तकों के अतिरिक्त आपने अन्यान्य विषयों की पुस्तकों पुस्तकालय से लाकर पढ़नी शुरू कर दी। आपकी परिश्कृत अभिरूचि तथा संस्कारों ने आपकी क्रमशः आध्यात्मिक पुस्तकों के अध्ययन-मनन की ओर प्रवृत्त किया। आपकी प्राथमिक षिक्षा ग्रामीण स्कूल से आरम्भ हुई और माध्यमिक शिक्षा के लिए आप त्रिवेणीगंज पढ़ने जाते थे वहाँ से आपने दसवीं कक्षा तक की षिक्षा प्राप्त की। आप अपने वर्ग में प्रथम स्थान पाते हुए सभी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते थे। स्वयं तथा ग्रामवासियों के लिए कीमती पुस्तकें खरीदकर पढ़ना सम्भव नहीं है, यह सोचकर आपने गाँव में एक पुस्तकालय की स्थापना करने का निष्चय किया। आपने अपने मित्रों के साथ मिलकर इस योजन को कार्यरूप में परिणत करने के लिए प्रयत्न शुरू कर दिया। गाँववालों ने भी सर्वहित के इस कार्य में सहयोग दिया। स्थानीय सत्संग मन्दिर में पूज्य मोती बाबा ने इस पुस्तकालय के लिए एक कक्ष प्रदान करने की कृपा की। पामाराध्य गुरूदेव महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज के नाम इस पुस्तकालय की स्थापना हो गई। गुरूदेव के शुभाषीर्वाद के फलस्वरूप थोडे़ ही समय में पुस्तकालय की बहुत उन्नति हो गई। पुस्तकालय के संचालन का पूरा भार आपने ही स्वेच्छा से उठा लिया और इसी क्रम में अपना वासा भी सत्संग मन्दिर मं ही रख लिया। वहाँ होनवाली स्तुति-प्रार्थना में आप नियमित रूप से सम्मिलित होते तथा सत्संग-प्रवचन सुनने का सौभाग्य आपको अनायास ही प्राप्त होने लगा। फलतः, आपका झुकाव सत्संग की ओर विषेश रूप से होने लगा। अतः आपने आध्यात्मिक ज्ञान की पिपासा के कारण पढाई स्थगित कर दी। आपकी प्रवृत्ति और सत्संग के प्रति आपके आकर्शण को देखकर पिताजी ने आपका विवाह कर देना ही श्रेयस्कर समझा। किन्तु आपने विवाह करना अस्वीकार कर दिया। इस दिषा में आपके पिताजी के सारे प्रयत्न आपके दृढ़ निष्चय के समक्ष निष्फल हुए।
    धीरे-धीरे आपका अधिकांश समय सत्संग मन्दिर में ही व्यतीत होने लगा, जहाँ आप सत्संग की पुस्तकें तथा अन्य आध्यात्मिक ग्रन्थों का अध्ययन-अनुशीलन करते रहते थे। भोजन के लिए भी जब आपने घर जाना बन्द कर दिया तो आपकी माताजी स्नेहवश स्वयं भोजन लेकर सत्संग मन्दिर आ जाती थीं। सन् 1954 ई0 के अक्टूबर माह की बात है। उस समय गुरूदेव सिकलीगढ़ धरहरा में विराज रहे थे। आपने वहाँ जाकर उनसे भजन-भेद की दीक्षा ले ली और घर से विरक्त होकर अधिकांश समय सत्संग मन्दिर में साधना -भजन और अध्ययन-चिन्तन में व्यतीत करने लगे।
    जब स्कूली शिक्षा का त्याग कर आप मचहा सत्संग मन्दिर में पुस्तकालय का संचालन करते हुए वैरागी साधु की तरह रहने लगे, तब करीब दो वर्षो के बाद अप्रैल, 1957 ई0 में महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज सत्संग-प्रचार के सिलसिले में मचहा ग्राम पधारे। वहाँ तीन दिनों तक सत्संग का आयोजन हुआ। उस सत्संग में आप भी सम्मिलित हुए और महर्षिजी के दर्शन-प्रवचन से बहुत प्रभावित हुए। सत्संग में आपको विचि़त्र शान्ति का अनुभव हुआ, अशांत मन को शान्त करने का संबल मिला। सत्संग के दौरान अपने प्रवचन में गुरू महाराज ने आपको लक्ष्य करके कहा था-’’जिन्होंने माता-पिता और घर का त्याग कर दिया है, उनका किसी छोटे कार्य में उलझे रहना ठीक नहीं है। जिस ध्येय की प्राप्ति के लिए माता-पिता के स्नेह-बंधन को तोड़ा है, उसके लिए यत्न नहीं किया जाय तो उनका गृह-त्याग देना महत्त्वहीन है। अन्याय छोटे-माटे व बाहरी कार्यों में उलझे रहने से कल्याण नहीं होगा।’’ गुरू महाराज की अमृत वाणी आपके अन्तर में बद्धमूल हो गयी और आपके मन में वैराग्य की भावना प्रबलतर हो उठी। आपका मन गुरूसेवा के लिए विचलित हो उठा। गुरू महाराज के कल्याणकारी सांकेतिक वचनों से पुस्तकालय-प्रभारी के दायित्वों से विचलित होकर उसी समय आपने गुरू महाराज से विनीत प्रार्थना की कि ’मुझे भी अपनी सेवा में रख लेने की कृपा करें।’

    उस समय गुरूदेव की सेवा में पहले से ही दो सेवक पूज्य श्रीसन्तसेवी बाबा तथा पूज्य श्रीभूपलाल बाबा। किसी अन्य सेवक की उस समय गुरू महाराज को आवष्यकता न थी, किन्तु आपकी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए उन्होंने आपको अपने साथ रख लेने की कृपा की। तब से आप गुरू महाराज के साथ ही रहने गले। उस समय गुरू महाराज द्वारा सम्पादित ’सत्संग-योग’ का प्रथम संस्करण प्रकाषित हुआ था, जिसमें बहुत सारी अषुद्धियाँ रह गई थीं। इन अशुद्धियों को आप मनिहारी आश्रम में रहकर शुद्ध किया करते थे। यह काम 1961 ई0 तक चलता रहा। इसके बाद से आप गुरूदेव के भण्डारी का काम करने लगे, जो 1973 ई0 तक लगातार चलता रहा। 1974 ई0 से 1975 ई0 तक ’षान्ति-सन्देष’-प्रेस के कार्य-भार का दायित्व आपने अपने ऊपर लिया। सन् 1964 ई0 में गुरू महाराज ने आपको संन्यासी वस्त्र का अधिकारी मानकर गैरिक वस्त्र प्रदान किया था, साथ ही शब्दयोग की क्रिया भी बतायी थी।
    एक बार की घटना है कि गुरू महाराज किसी का कोई चढ़ाव नहीं लेते थे, चाहे वह अन्न, वस्त्र, रूपये-पैसे कुछ भी हो। गुरूदेव की सेवा करने से वंचित हो जाने के कारण श्रद्धालु भक्त जन व्याकुल थे। तब पूज्य श्रीहरिनन्दन बाबा लोगों के बहुत अनुनय-विनय पर उनके द्वारा दी गई वस्तुओं और रूपयों को अपने पास रख लेते थे, ताकि उनकी भक्ति-भावना आहत न हो और गुरू महाराज को इसकी जानकारी नहीं देते। सन् 1971 ई0 में जब गुरू महाराज अस्वस्थ हुए तो हरिनन्दन बाबा ने भक्तों द्वारा दिये हुए रूपयों से पटना में चिकित्सा करवाई और शेष रूपयों को पास में ही रहने दिया। गुरूदेव तो अन्तर्यामी थे। स्वस्थ होने पर उन्होंने पूछा कि मेरी चिकित्सा के लिए रूपये कहाँ से खर्च हुए? तब गुरूदेव को सारी बातों से अवगत कराया गया और बताया गया कि इतने रूपये षेश हैं। उन रूपयों को हरिनन्दन बाबा ने लाकर गुरूदेव के सम्मुख रख दिया। इसपर गुरू महाराज ने कहा, ’’तुम्हारा हाथ कभी पैसे से खाली नहीं रहेगा।’’
    विद्यार्थी जीवन से ही अध्ययन और पठन-पाठन का जो क्रम पूज्य हरनिन्दन बाबा के साथ चला, वह आज भी अनवरत रूप से जारी है। आध्यात्मिक ग्रन्थों के अतिरिक्त आपने विभिन्न विषयों की अनेकानेक पुस्तकें पढ़ीं और उनसे ज्ञान का संचय किया। इसी अध्ययन से आपको प्राकृतिक चिकित्सा का विस्तृत ज्ञान प्राप्त हुआ और इस चिकित्सा पद्धत्ति पर आपका विष्वास दृढ़ हुआ। सन् 1972 ई0 मे अस्वस्थ होने पर आपने प्राकृतिक चिकित्सा करवायी थी। गुरू महाराज के भोजन बनाने के लिए आपने गुरूप्रसाद दासजी को प्रषिक्षित किया और एक दिन परमाराध्य गुरूदेव से प्रार्थना की, ’’हुजूर! मेरी इच्छा हो रही है कि मैं एक बार अपनी प्राकृतिक चिकित्सा करवाऊँ। गुरू प्रसादजी आपके लिए भोजन बनाना सीख गये हैं। जबतक मैं उपचार में रहूँगा, ये आपका भोजन बनाते रहेंगे।’’ गुरू महाराज ने सहर्श आपको आज्ञा प्रदान करने की कृपा की। आप उपचार के लिए रानीपतरा गये, किन्तु गरू महाराज के सान्निध्य का लाभ छोड़ कर रहने में आपका चित्त विचलित रहने लगा। अतः इलाज बीच मेें ही छोड़कर आप वापस कुप्पाघाट आश्रम आ गये और फिर इलाज भी वहीं करवाया। आपके स्वास्थ्य-लाभ के बाद गुरू महराज गुरूप्रसादजी को वहीं भेजना चाहते थे, जहाँ से वह आये थे, किन्तु आपकी विनती पर गुरू महाराज ने उनको भी हमेशा के लिए अपने पास ही रख लिया।
    इस तरह श्रीहरिनन्दन बाबा गुरू महाराज की सेवा में सदा तत्पर रहा करेते थे। पूज्य श्रीशाही स्वामीजी महाराज के बाद स्वामी श्रीचतुरानन्द बाबा महर्षि मेंहीं आश्रम, कुप्पाघाट के व्यवस्थापन का कार्य करते थे। तत्पश्चात् यह दायित्व आपके ऊपर आ गया। अ0 भा0 सन्तमत-सत्संग-महासभा के निर्णयानुसार सन् 1987 ई0 से आपने भजन-भेद देना प्रारम्भ किया। अभी तक आपने 2,650 लोगों को दीक्षित किया है।
    पूज्य श्रीहरिनन्दन बाबा बहुत ही ध्यानी महात्मा हैं। इनका जीवन सादगी और सात्त्विकता का प्रतीक है।