श्रीभगीरथ दासजी महराज

पूज्यपाद गुरूसेवी स्वामी श्रीभगीरथ दासजी महराज

बिहार राज्य के पुरैनियाँ जिलान्तर्गत रूपौली थाने के लालगंज ग्राम में एक सद्गृहस्थ स्व0 जानकी मण्डलजी रहा करते थे। ईष्वर में उनकी असीम आस्था थी। वे प्रत्येक वर्ष वैशाख अमावस्या से पूर्णिमा तक अपने घर पर भागवत की कथा पण्डितों से करवाते थे। 15 मई, 1943 ई0 तदनुसार वैशाख शुक्ल एकादशी, शनिवार को पूज्य बाबा श्रीभगीरथ दासजी महराज का लालगंज की भूमि पर अवतरण हुआ, जब अपराहृकाल में भागवत की कथा का पाठ हो रहा थां इसीसे आपके दादा स्व0 जानकी मण्डलजी ने आपका शुभ नाम ‘भागवत मण्डल’ रख दिया था। आपके अवतरण के बाद ही आपकी पूजनीया माता स्व0 धनसी देवी बीमारी से अशक्त हो गई । आपके पूज्य पिता श्रीबाला मण्डलजी ने आपके पालन-पोषण का भार आपकी दादी एवं छोटी फूआ को सौंप दिया। माता का दूध आप बहुत थोड़ी ही पी सके थे। बचपन से ही आप शान्त प्रकृति के थे। चुपचाप एकान्त में बैठे रहना आपको अत्यधिक प्रिय था। आपके स्वभाव को देखकर आपके परिवार के लोग आश्चर्यचकित हुआ करते थे। बचपन में साधु-महात्माओं को देखकर आप उनकी ओर चल पड़ते थे और समीप पहुँचकर दोनों हाथ जोड़कर कहने लगते, ’’दण्डोत बाबा...................दण्डोत बाबा.................।’’ पढ़ने-लिखने की रूचि आपमें बिल्कुल नहीं थी, केवल एकान्त में आँखें बन्द कर बैठे रहना आपको पसन्द था। जब आपकी दादीजी और फुआजी अपने खेतों में काम करने जातीं तो आप भी उनलोगों के साथ खेतों पर जाते और  जब वे काम में लग जातीं तो आप खेत की मेड़ पर पालथी मारकर बैठ जाते और आँखें मूँद लेते थे। ध्यान की इस मुद्रा में बैठा देखकर दोनों आश्चर्यचकित होतीं और जोर-जोर से पुकारने पर भी आप आँखें नहीं खोलते, तब समीप जाकर और नाम लेकर जब पुकारे जाते तो आप तंग होकर उठ खड़े होते और बिना कुछ बोले ही वहाँ से अकेले ही घर की ओर चल देते। आप जब कुछ बड़े हुए तो घर के लोगों ने आपको पढ़ाना-लिखाना चाहा; लेकिन आपकी इसमें बिल्कुल ही रूचि नहीं थी। माता-पिता के प्यार से मनाने और बहुत दबाव डालने पर आप खानगी स्कूल में पढ़ने गये। गुरूजी जो कुछ पढ़ाया करते, वह आपको बहुत जल्द याद हो जाता। इससे प्रभावित होकर गुरूजी आपको बहुत मानने लगे। दो वर्ष के बाद यह सुनकर कि प्राइमरी स्कूल में अच्छी पढ़ाई होती है, आप माता-पिता की आज्ञा से वहाँ पढ़ने लगे। इस स्कूल के प्रधानाध्यापक श्रीअरविन्द बाबू थे। वे आपके शान्त स्वभाव को देखकर खूब मन से आपको पढ़ाने लगे। एक दिन श्रीअरविन्द बाबू ने कहा, ’’तुम्हारानाम भागवत है, भागवत तो एक पुराण का नाम है। अपने ही देश में एक बहुत बड़े धार्मिक राजा हो गये हैं, उनका नाम था राजा भगीरथ; उन्होंने तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर उतारा था। इसलिए मैं तुम्हारा नाम ’भगीरथ मण्डल’ रखता हूँ।’’ यह कहकर उन्होंने अपने हाथ से आपकी लेखन-पुस्तिका के मुखपृष्ठ पर ’भगीरथ मण्डल’ लिख दिया। तभी से सब लोग आपको ’भगीरथ’ कहने लगे। जब आप पूज्यपाद प्रातः स्मरणीय सद्गुरू महर्षि मेंही परमहंसजी महाराज की सेवा में रहने लगे तो आपकी अहर्निश सेवा देखकर श्रद्धालु लो आपको ’गुरूसेवी’ कहने लगे। इसीलिए आज आप गुरूसेवी श्रीभगीरथ बाबा के नाम से जाने जाते हैं।
जब आप प्राइमरी स्कूल में तृतीय वर्ग की परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुए, तब आपने प्रधानाध्यापक श्रीअरविन्द बाबू से कहा, ’’मेरी इच्छा होती है कि मैं चतुर्थ वर्ग में अपना नाम ढोलबज्जा मध्य विद्यालय में लिखवाऊँ; क्योंकि इस स्कूल में चतुर्थ वर्ग से सातवें वर्ग तक की पढ़ाई होती है।’’ श्रीअरविन्द बाबू ने कहा कि ठीक है, कल तुम मेरे बासे पर आना, तुम्हारा नाम लिखवा दूँगा। दूसरे दिन आप प्रधानाध्यापक के यहाँ पहुँचे, वे तैयार ही थे। आपने उनके चरणों को छूकर प्रणाम किया। उन्होंने आशीर्वाद देकर ढोलबज्जा विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्री मदन बाबू से मिलकर आपका नामांकन वहाँ करवा दिया। नामांकन के बाद जब आप घर लौटे तो उसी शाम आपको तेज ज्वर हो आया। रात भर आप ज्वर में तपते रहे, लेकिन धीरे-धीरे ज्वर उतर गया और आप नियमित रूप से विद्यालय जाने लगे। आपने वहीं चतुर्थ वर्ग से सातवीं कक्षा तक की पढ़ाई की। जब आप छठी कक्षा में थे तो आपको मेधावी छात्र होने के कारण सरकारी कल्याण विभाग द्वारा छात्रवृत्ति भी दी गई थी। सातवें वर्ग की परीक्षा के अंतिम दिन जब आप घ्ज्ञर लौट रहे थे, तभी एकाएक आपने मित्र प्रकाशजी से बालुका-मैदान में पूछा, ’’प्रकाश! मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद तुम क्या पढ़ोगे- कला या विज्ञान?’’ उन्होंने कहा कि मैं तो डॅक्टरी की पढ़ाई करूँगा। इसपर प्रतिक्रिया देते हुए आपने कहा, ’’ हाँ,तुम डाॅक्टरी की पढ़ाई कर सकते हो, क्योंकि तुम्हारे पिता अमीर हैं, लेकिन मेरे पिता तो गरीब हैं, इतना धन वे मेरी पढ़ाई पर कहाँ से खर्च कर सकेंगे? लेकिन सोचता हूँ कि यदि आगे नहीं पढ़ सका तो किसी महात्मा की शरण में जाकर उन्हीं की सेवा करूँगा और जो क्रियाएँ वे बतायेंगे, वही करने लगूँगा।’’ आपने इतना ही कहा था कि हठात् देखते हैं कि सामने एक वयोवृद्ध महात्मा गेरूआ वस्त्र धारण किये बैठे हुए हैं। उनका ललाट चैड़ा और भव्य है तथा मस्तक के बायें भाग में एक टेटना (मांसपिण्ड) है। केष श्वेत और लम्बे-लम्बे हैं, बढ़ी हुई दाढ़ी और घनी मूँछें हैं। वे सुदीप्त चेहरे और चमकीली आँखों से आपको ही निहार रहे हैं। मानों कह रहे हों- ’’मुझे खूब पहचान लो, मेरी ही सेवा में तुम्हें आजीवन रहना है।’’ अपने सामने महात्माजी को देखकर आपने मस्तक झुका लिया, आँखें बन्द कर लीं और उन्हें प्रणाम किया। प्रणाम निवेदित करने के बाद जब आपने आँखें खोलीं तो पाया कि महात्मा तो अदृश्य हो चुके हैं। इस दृश्य को केवल आपने ही देखा, आपके साथी प्रकाश ने नहीं। उसी दिन से आपके मन में भगवद्भक्ति और प्रगाढ़ हो गई तथा पढ़ने-लिखने के प्रति अरूचि हो गई। फिर भी मिडिल पास करने के बाद आपने पिता की आज्ञा से गाँव से लगभग 3 कि0 मी0 दूर उच्च विद्यालय, कदवा की आठवीं कक्षा में अपना नामांकन कराया और अन्यमनस्क ढंग से विद्याध्ययन करने लगे। किसी कारणवश उच्च विद्यालय  में आप वार्शिक परीक्षा नहीं दे सके। पुनः उच्च विद्यालय, ढोलबज्जा की नौवीं कक्षा में अपना नामांकन कराया। कुछ दिनों तक विद्याध्ययन के पष्चात् अद्ध्रवार्षिक परीक्षा के पूर्व ही आपने पिताजी के आदेश से चेचक-उन्मूलन के प्रशिक्षण हेतु भाग लिया और उसी के साथ आपकी स्कूली शिक्षा का अन्त हो गया। तत्पश्चात् घर पर ही रहकर अपने भाइयों के साथ घर-गृहस्थी का कार्य उदासीन भाव से करने लगे। बालुका-मैदान में महात्माजी के दर्शन का अप्रतिम चित्र बार-बार आपके सम्मुख उपस्थित हो जाता था और अन्तःप्रेरणा होती थी कि मुझे उन्हीं महात्मा के पास चला जाना है तथा उनकी सेवा करके और भक्ति की युक्ति जानकर भगवद्भक्ति करनी है। इसी विचार में कई वर्ष और बीत गये, लेकिन वह अलौकिक दृश्य आँखों के समने हमेशा तिर आता था। सत्संग में आपकी अत्यधिक रूचि देखकर पुराने सत्संगी स्व0 हनुमान दासजी ने आपको प्रेरण देते हुए कहा, ’’मेर गुरूदेव महर्षि  मेंहीं परमहंसजी महाराज टीकापट्टी आनेवाले है।, अतः आप उस तिथि को उनके दर्शन के लिए चलें। गाँव के अन्य सत्संगप्रेमियों के साथ आप भी महर्षिजी के दर्शन के लिए चल पड़े। वहाँ मंच पर विराजमान सद्गुरूदेव के दर्शन कर आप हतप्रभ हो गये-ये तो वही महात्मा हैं, जिन्होंने बालुका-मैदान में मुझे दर्शन दिया था। आपने दूर से ही उन्हें प्रणाम किया और मन-ही-मन सोचने लगे कि अब मुझे कहीं भटकने की जरूरत नहीं है, मुझे तो इन्हीं की सेवा में आजीवन रहना ही है, ये ही महात्म मेरे कर्णधार बनेंगे। उसके दूसरे दिन 1 दिसम्बर, 1966 ई0 को रात्रि 9 बजे सद्गुरू महाराज ने आपको भजन-भेद बतला दिया। भजन-भेद लेने के उपरान्त जब आप प्रातःकाल उनके आवास पर प्रणाम निवेदित करने गये तो वे आपको एकटक देखने लगे, मानेां कोई पूर्वपरिचित व्यक्ति हों। उनके देखने मात्र से आपके षरीर के रोंगटे खड़े हो गये। उस समय भी आपको ऐसा भान हुआ कि अवष्य ही गुरूदेव मुझे अपनी सेवा में रख लेने की कृपा करेंगे। आपने गुरूदेव के श्रीचरणों में पाँच  आने रखते हुए प्रणाम किया और सत्संग-पण्डाल में चले गये। प्रातःकालीन सत्संग में जब पूज्य गुरूदेव को मंच पर ले जाने के लिए सत्संग-सेवकों ने राह में एकत्रित सत्संगियों को हटाना षुरू किया तो आप भी राह में एक किनारे करबद्ध हो खड़े हो गये। गुरूदेव जब रास्ते से गुजरते हुए आपके करीब पहुँचे तो आपके सम्मुख आकर ठहर गये और एकटक गौर से आपको देखने लगे। आपके मन में यह बात आई कि क्यों गुरूदेव मुझे ही इस तरह बार-बार देख रहे हैं? पूज्य गुरूदेव आपको एकटक देखकर मंच पर चले गये। सत्संग की समाप्ति के पष्चात् आपने गुरूदेव की बतायी हुई साधना करने लगे। एक दिन की बात है, आप दक्षिणाभिमुख बँगले में उत्तर सिरहाना करके चित्त सोये हुए थे, चाँदनी रात थी। ढ़ाई-तीन बजे की अमृत वेला में लाठी का अगला सिरा पेट पर जोर से दबाते हुए और डाँटते हुए गुरूदेव कह रहे हैं- ’’अरे! अभी ध्यान करने का समय है और तुम सोये हुए हो; उठो।’’ आपकी नींद औचक ही टूट गई और आने देखा कि सामने पूज्य गुरूदेव हैं, जो धीरे-धीरे पीछे हट रहे हैं। गुरू महाराज को देखकर आप अवाक् रह गये। इतनी रात में गुरूदेव यहाँ कैसे? चाँदनी के प्रकाष में आप गुरूदेव को साफ-साफ देख रहे थे और आपके देखते -ही-देखते गुरूदेव अदृष्य हो गये। गुरूदेवजी जैसे महान् सन्त सुपात्रों को ही अपने दर्षनों से कृतार्थ करते हैं और आवश्यक दिशा-निर्देश देते हैं। पूज्य गुरूदेव के दर्शनोपरान्त उनकी सेवा करने की तीव्र इच्छा आपके मन में जाग उठी। प्रभु अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं। सन्त सद्गुरू महारज ने अपकी सच्ची प्रार्थना जल्द ही स्वीकार की।
इस दर्षन के दो महीने बाद आपको मालूम हुआ कि पूज्य गुरूदेव कोशकीपुर आये हुए हैं। यह गाँव लालगंज से पूरब लगभग 5 कि0 मी0 है। यह जानकारी मिलते ही आपके मन में आया कि अब घर-गृहस्थी का कार्य छोड़कर पूज्य गुरूदेव की सेवा में चला जाऊँ। अपने मन की बात आपने मन में ही रखी। अवसर पाकर आपने अपनी माताजी को बताया कि पूज्य गुरूदेव कोशकीपुर आ रहे हैं। मैं उनके दर्शन और सत्संग के लिए वहाँ जाऊँगा। माता थोड़ी देर मौन रहीं, फिर उन्होंने कहा कि जाओ, मगर जल्दी लौट आना। दूसरे दिन सुबह सूर्योदय के पूर्व ही आपने खाने का कुछ सामान साथ लिया और ’रामचरितमानस-सार सटीक’ की प्रति साथ लेकर तथा माताजी को प्रणाम कर आप घर से चल पड़े।