श्रीरामलगन दासजी महराज

पूज्यपाद स्वामी श्रीरामलगन दासजी महराज   

बीसवीं सदी के महान् सन्त पूज्यपाद सदगुरू महर्षि मेंहीं  परमहंसी महाराज के निकटवर्ती सेवक शिष्य स्वामी श्रीरामलगन दासजी महाराज का अवतरण इस धराधाम पर सन् 1924 ई0 के आसपास एक सभ्य, सुसम्पन्न वैष्य जायसवाल परिवार में कंकलाहा नामक गाँव में हुआ था। यह गाँव पुरैनियाँ जिले में है। जन्म के चार वर्ष बाद आपके माता-पिता इस असार संसार से स्वर्ग सिधार गये थे। इस कठोर आघात से आप अत्यन्त शोक-सन्तप्त एवं मर्मबिद्ध हुए। यह घाव अभी भरा भी नहीं था कि आपकी बहन एक महीने बाद चिरवियोगिनी बन गयी। विपत्तियाँ ही आपकी संगिनी बन गईं। माता-पिता ने बड़े दुलार से बापका नाम ‘रामलगन’ रखा था। पिता श्रीनारायण प्रसाद जायसवाल और माता श्रीमती बबिता देवी धार्मिक प्रवृति की थीं। आपके पिता दो भाई थे, बड़े भाई का नाम श्री रामखेलावन भगतजी था। उनकी साधना बड़े ऊँचे दर्जे की थी। इसलिए लोग उनपर अपार श्रद्धा रखते थे। लोग आदरपूर्वक उनको ‘भगतजी’ अथवा ‘बाबाजी’ कहा करते थे। ऐसे ही सिद्ध योगी-कुल के आप एकमात्र कुलभूशण थे; 4 एकड़ से अधिक की अचल सम्पत्ति के आप स्वयं मालिक थे। आपके बड़े बाबूजी ने माता-पिता की मृत्यु के पष्चात् आपको ननिहाल पहुँचा दिया था। आपने वहीं किंचित् विद्या प्राप्त की। आपके अन्दर बचपन से ही वैरारग्य भाव उमड़ने लगा था। भागलपुर जिले के शकरपुर-नन्हकार में आपका ननिहाल था, जहाँ गोपीचन्द सम्प्रदाय का धाम था। गोपीचन्द के वैराग्ययुक्त गीतों ने आपके पूर्व संस्कारों को जगा दिया और आप आठ वर्ष की उम्र में वहाँ से भाग निकले। बहुत प्रयास के बाद आपको दो दिनों के बाद घर वापस लाया गया।
     आपकी नानी नहीं चाहती थीं कि एकमात्र कुलदीपक वैराग्य धारण कर ले, इसलिए उन्होंने आपकी शादी कर देना ही बेहतर समझा; परन्तु आपके बड़े बाबूजी इसका सदा विरोध करते रहे। उन्हें आपके भावी जीवन की परख थी।
    आपके बड़े बाबूजी राँको वासा सकरोहर में रहकर साधना-भजन किया करते थे, लेकिन बीच-बीच में आपके कुषल-क्षेम की जानकारी लेने अवश्य जाते और आर्थिक मदद भी करते। जब आपकी नानीजी स्वर्ग सिधारीं, तब उन्होंने आपको अपने पास ही रख लिया। आपके बड़े बाबूजी आपको नित्य प्रति ‘योगवाशिष्ठ-सार’ सुनाया करते थे। उसकी छाप आपके मन पर पड़ी। सन् 1946 ई0 में आपने महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज के प्रमुख शिष्य पूज्यपाद श्रीशाही स्वामीजी महाराज के साथ परवत्ती (भागलपुर) में उनकी शिष्यता ग्रहण की। तभी से आप आत्मकल्याण की साधना में प्राणपण से जुट गये। आपके घर पर गाय और घोड़े भी थे। आप मवेशियों के लिए घास लाने जाते तो खुरपा और बोरा धरे ही रह जाते और आप किसी मेड़ पर ध्यानस्थ हो जाते। हाट-बाजार गये ग्रामीण जब सायंकाल में गाँव लौटते तो आपको उसी तल्लीन दशा में पाते। दिन-भर की थकान लिये जब पशु-पक्षी, चरवाहे, मवेशी सभी अपने-अपने गन्तव्य को लौट रहे होते, आप एक अक्लान्त पथिक की तरह रूहानी यात्रा पर रहते। इस समय तक आपकी गति बहुत बढ़ गई थी। पूज्य बाबा श्रीषाही स्वामीजी महाराज जब कभी आपसे मिलने आते तो उनके आने के पहले ही आप उनका आसन तैयार करवा देते। इस प्रकार की विलक्षण बातें आपके लि सामान्य और सहज थीं। जब आपको दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई तो गुरूदेव ने आपको ज्ञान-प्रसार के लिए प्रेरित किया; लेकिन आपने ज्ञान का प्रसार करना नहीं चाहा। इस तरह गुरू की अवहेलना के कारण आप सख्त बीमार पड़ गये; षारीरिक षक्ति अत्यन्त क्षीण हो गई; उठना-बैठना, चलना-फिरना असम्भव हो गया।
कुछ दिनों बाद आपको ज्ञात हुआ कि निकट बेलदौर में ही गुरूदेव पधारे हैं। चाचा के आदेश से येन-केन प्रकारेण उनके दर्शन के लिए बेलदौर आये। उनके सेवक आपको उनसे मिलने नहीं देते थे क्योंकि आपका चेहरा मलिन और विक्षिप्त-सा था। एक दिन मौका पाकर आप गुरूदेव के पास पहुँचे और उनके पावन चरणों में बैठ गये। गुरूदेव ने बड़े गौर से आपको देखा और अपने पाकशास्त्री श्रीभूपलाल दासजी से कहा, ‘‘ इनको खाने के लिए क्यों नहीं पूछते हो?’’ ऐसा कहने पर श्री भूपलाल बाबा ने आपको खिलाया-पिलाया। उसी दिन आपने गुरूदेव से पूछा कि ‘‘हुजूर! मुझे रोग बहुत तंग कर रहा है।’’ उन्होंने कहने की कृपा की, ‘‘जब तक भोग है, तंग करेगा।’’ इतना कहते ही आप लगभग स्वस्थ हो गये। स्वस्थ हो जाने पर आपने यह संकल्प किया कि गुरूदेव का दिया हुआ यह नीरोग शरीर अब उन्हीं की सेवा में लगा दूँ।
    सन् 1958 ई0 से आप गुरूदेव की सेवा में छाया की भाँति लगे रहे और अपना ’रामलगन’ नाम सार्थक किया। वस्तुतः आपका नाम गुणवाचक हो गया। जिस निष्ठा-प्रेम से भगवान् राम ने गुरू वशिष्ठ की सेवा की थी, उसी चित्र को यहाँ रामलगन बाबा ने साकार कर दिखाया। आप गुरूदेव के पाँव दबाते-दबाते उन्हीं के पावन चरणों पर सो जाते। गुरूदेव के द्वारा जगाये जाने पर आप जागते। आपको उन्हें जगाने के क्रम में गुरूदेव कहते, ’’उठें ‘न’रे रामलगन! तोहें बड़ी भारी लगै छैं।’’ इसके उत्तर में आप कहते थे कि हुजूर! टापने’ संसार क भार हल्का करै खातिर आयल छियै ओकरा से जादा हम्में’ भारी छियै?’’
    आप गुरूदेव के कटृर भक्तों में एक थे। आपकी गुरू-भक्ति देखकर हमें प्राचीन काल के गुरूकुल की याद आती है, जब विद्याध्ययन के लिए आये हुए छोटे-छोटे बालक विद्या प्राप्त करते और अपने गुरू की सेवा में सदा तत्पर रहते थे। आपने गुरू महाराज की जेसी एकनिष्ठ सेवा की और गुरूदेव का प्रेम पाया, ऐसा भाग्य तो बिरले भाग्यवान् को ही प्राप्त हो पाता है। गुरूदेव आपको’बेटा’ कहकर पुकारते थे। एक बार पटना में गुरूदेव ने सबों की उपस्थिति में आपसे वस्त्र उतार देने को कहा। आपने तत्काल गुरू-आदेश का पालन किया। पुनः कहा-‘‘कौपीन भी उतार दो।’’ कहने भर की देर थी, उतारने में देर नहीं लगी। गुरूदेव ने उपस्थित महानुभावों से कहा, ‘‘सब लोग इनके शरीर को देखो, द्वापर में अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रतधारी भीष्म पितामह थे और कलियुग में ये ही मेरे पुत्र अखण्ड बालब्रह्मचारी हैं। इन्होंने आजतक निश्कलंक ब्रह्मचर्य ब्रत का पालन किया है। किसी भी नारी को आजतक बुरी दृष्टि से नहीं देखा है।’’ इस प्रकार गुरूदेव की दृष्टि  में आप भीष्म पितामह के समान थे। महर्षिजी की शारीरिक सेवा से लेकर हृीलचेयर चलाने तक के समस्त कार्यों से आप कभी मुँह नहीं मोड़ते थे। आपके मन, वाणी और आचरण में समानता थी। जो मन से कुछ, वचन से कुछ और कर्म से भी कुछ और हो, वह कभी भी सच्च सन्त नहीं हो सकता। आपका स्वभाव नारियल के फल की तरह ऊपर से कठोर और भीतर से मृदुल था। इस बात की सही जानकारी आपके स्नेही-जन को थी।
    आपके और गुरूदेव के बीच का पारस्परिक स्नेह-प्रेम नीच प्रकृति के एक व्यक्ति से देखा नहीं गया। उसने गुरूदेव के निकट आपकी चुगली की। गुरूदेव ने अप्रसन्न होकर कहा, ‘‘रामलगन! तुम चले जाओ।’’ ऐसे वचन सुनते ही आपके पैरों के नीचे की मानो धरती ही सरक गई। माथ घूम गया। आपने सभी गुरू-भइयों को कह दिया कि ‘‘ कोई मुझे न छेड़े, मैं अन्न-जल त्यागकर समाधिस्थ होने जा रहा हूँ। बाप-बेटे में आज ही फैसला हो जाय।’’ इतना कहकर आप एक कमरे में बन्द हो गये और नश्वर शरीर को त्याग देने की बात आपने मन में ठान ली। 11-20 घण्टेे ही बीते होंगे कि गुरूदेव आपका हठ देखकर विचलित हो उठे। जैसे बछड़े के वियोग में गाय हंुकार भरती है, वैसे ही गुरूदेव जोर-जोर से पुकारने लगे-‘‘बेटा रामलगन! तुम कहाँ हो, मेरे पास चले आओ। मेरे पुत्र रामलगन को कौन मुझसे दूर कर सकता है।’’ गुरूदेव की पुकार में पुत्र-वियोग की मार्मिक पीड़ा थी। गुरूदेव के बार-बार पुकारने पर आप अपने को राक न सके और अपना संकल्प तोड़कर गुरूदेव के श्रीचरणों में जाकर लिपट गये। आँखों से अविरल अश्रु की धारा प्रवाहित हो रही थी। आपके चेहरे के भावों से स्पष्ट लक्षित हो रहा था कि आप गुरूदेव से मूक प्रार्थना कर रहे हैं कि ’हे गुरूदेव! टाप ही मेरे सर्वस्व हैं। यदि आपकी सेवा का सौभाग्य है, तो यह जीवन है, अन्यथा यह जीवन जीनेयोग्य नहीं।
 

एक दिन किसी सत्संगी के आग्रह पर बिना गुरूदेव की आज्ञा के आप पीरपैंती (भागलपुर) चले गये। सवेरा होन पर सेवक मुँह धुलाने गुरूदेव के पास गये, गुरूदेव ने पूछा, ’’के छेक, रामलगन?’’ सेवक ने कहा, ’’जी नैं सरकार!’’ गुरूदेव ने फिर कहा, ’’जा, हमर बेटा रामलगन के बुलाबो। तबे हम्में’ मुँह-हाथ धोबै।’’ लेकिन रामलगन बाबा तो थे नहीं, आते कैसे? गुरूदेव ने आपकी अनुपस्थिति में नित्य क्रिया छोड़ दी। न जाने किस अज्ञात प्रेरणा से आप पीरपैंती में स्वयं चिन्तित हो उठे और सबकुछ छोडकर कुप्पाघाट दौड़े आये और अपने गुरूभाई से गुरूदेव कमा समाचार पाकर बेहाल हो उठे। गुरूदेव आपको समीप पाकर प्रसन्न हो उठे और तब ही नित्य क्रिया से निवृत्त होकर उन्होंने अन्न-जल ग्रहण किया। 3 मई, 1993 ई0 में एक आपसी विवाद के कारण आप कुप्पाघाट आश्रम से महर्षि मेंहीं धाम, मणियारपुर में आकर रहने गले। 31 अगस्त, 1994 ई0 को रात 8 बचे अपनी सुरत को अन्तर्मुख करके आपने पार्थिव शरीर का परित्याग कर दिया। 2 सितम्बर, 1994 ई0 को संध्या 4 बजे आम और चन्दन की लकड़ी, घी, जौ, नये वस्त्रों आदि से आपकी चिता सुसज्जित की गई और वैदिक मन्त्रों के उच्चार तथा गाजे-बाजे के बीच आपका दाह-संस्कार किया गया। महर्षि मेंहीं , मणियारपुर के सभी गुरूभाइयों की उपस्थिति में अजय कुमार ’भारती’जी ने चिता को अग्नि दी। उसी दिन विषाल भण्डारा किया गया, जिसमें उस क्षेत्र के तथा बाहर के लगभग 20,000 व्यक्ति उपस्थित थे। आपके दाह-संस्कार के दिन पूज्य बाबा श्रीषाही स्वामीजी महाराज उपस्थित नहीं थे, क्योंकि सत्संग-प्रचार के लिए वे दिल्ली गये थे। जब वे आये तो उनके समक्ष भी 5-2-1994 ई0 को दुबारा विशाल भण्डारना हुआ। आपके प्रधान सेवक स्वामी निरंजनानन्द ब्रह्मजी हैं, जिन्होंने अन्त तक आपकी सेवा पूरी निश्ठा से की। साधु-समाज आज भी आपकी सेवा-भावना और सद्गुरू के प्रति अप्रतिम निष्ठा की प्रशंसा करते नहीं अघाते।