श्रीभुजंगी दासजी महराज

पूज्यपाद बाबा श्रीभुजंगी दासजी महराज

जन्म-तिथि जन्म-स्थान एवं माता-पिताः आपका अवतरण बिहार राज्य के मुँगेर जिलान्तर्गत रामपुर नामक ग्राम में श्रीनत्थू मण्डलजी एवं श्रीमती बासो देवी के कनिष्ठ सुपुत्र के रूप में 5 जनवरी 1122 ई. को हुआ । आपके माता-पिता बहुत ही धार्मिक प्रवृति के थे । आपके एक भाई तथा आपकी चार बहनें थीं लेकिन चारो बहनों का देहावसान बाल्यकाल में ही हो गया था। आपके ज्येष्ठ भ्राता श्रीमहावीर मण्डल का देहावसान नवम्बर 1142 ई. में 35 वर्ष की अल्पायु में ही हो गया। वे अपने पीछे एक पुत्र और एक पुत्री को छोड़ गये।

बाल्यकालः आप बचपन से ही शान्त प्रवृति के थे। साधु-सज्जनों की संगति का लाभ आपको कच्ची उम्र से ही मिलने लगा था। एक बार की बात ळे कि आपके बगीचे में एक साधु बाबा ने महुआ वृक्ष के नीचे अपना आसन जमा दिया था। साधु बाबा को देखकर आप आश्चर्यचकित हुए तथा उनकी जीवन-शैली और साधना की पद्धति के प्रति जिज्ञासु हो उठे। यह आपके पूर्व जन्म का संस्कार ही था कि बाल्यकाल से ही साधु-सन्तों को देखकर आपके मन में भक्ति-भाव उमड़ पड़ता था। सात-आठ वर्ष की आयु में एक बार अपने माता-पिता के साथ कालीघाट कलकता गये थे। वहाँ एक साधु बाबा मिले,जो आपको देखकर नाचने लगे। उन्हें देखकर पहले तो आप भयभीत हो उठे,किन्तु बाद में भय जाता रहा। बचपन की इस घटना के सम्बन्ध में आप महज इतना ही कहते हैं कि साधु महाराज कौन थे, क्यो नाच रहे थे यह तो अज्ञात ही और यह समझा पाना कठिन है कि इस घटना का रहस्य क्या है। 

 

शिक्षाः ग्रामीण विधालय से ही आपकी प्रारम्भिक शिक्षा हुई। चैथी और पाँचवीं कक्षा की पढ़ाई के लिए आप गाँव से तीन किलोमीटर दूर महमदा गाँव से तीन कलोमीटर दूर महमदा गाँव के स्कूल में जाते थे। केशोपुर जमालपुर के रेलवे बिहारी इंगलिश स्कूल से छठी और सातवीं कक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1938 ई0 के नवम्बर माह में आपने मैट्रिक बोर्ड की परीक्षा पास की। अपरिहार्य कारणों से आप की पढ़ाई जारी न रख सके। सन् 1939 में आप विद्यार्थियों को पढ़ाने का कार्य करने लगे, किन्तु जुलाई, 1941 ई0 में आपने ईस्ट इण्डिया रेलवे ;म्ण्प्ण्त्ण्द्ध के जमालपुर कारखाने में आप नौकरी में लग गये, जहाँ से दिसम्बर, 1971 ई0 में आपने अवकाश पाया। सेवा-निवृत्ति के बाद आपको सरकारी पेन्शन मिलने लगी।
सात-आठ वर्ष की छोटी उम्र में ही आपका विवाह हो गया था, परन्तु आपमें जन्मजात योगी के लक्षण मौजूद थे, जिसके कारण आपका मन सांसारिकता में नही रमा। आप स्वभाव और व्यवहार से वीतरागी सत्पुरूष हैं। आपने कुछ वर्षो तक परिवार में रहकर भी एक तपस्वी की भाँति जीवन बिताया। कालान्तर में अपरिहार्य कारणों से वैवाहिक सम्बन्ध टूट गया और आपकी पत्नी का दूसरा विवाह हो गया। उसके बाद आप आश्रम बनाकर रहने लगे। आपके सम्बन्ध में गुरू महाराज ने कहा थाः’’ भुजंगी दास सन्तमत का नमूना है। हर एक सत्संगी को इसी तरह होना चाहिए, जिस तरह भुजंगी दास अपनी कमाई से अपना निर्वाह कर साधना-भजन किया करते हैं।’’ सन् 1931 ई0 के अप्रैल महीने से एक हितैशी की प्रेरणा से सत्संग में षामिल होना आपने षुरू किया। सन् 1931 ई0 में, दरियापुर जमालपुर में, आपको महर्शिजी के प्रथम दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मुंगेर जिले का ऋषि-कुण्ड बड़े ही मनोरम वातावरण में स्थित है। इसी स्थान पर महर्शिजी ने आपको दिसम्बर, 1931 ई में दीक्षा प्रदान की थी। तत्पश्चात, 15 वर्षो के बाद, सिकलीगढ़ धरहरा में महर्शिजी के द्वारा आपको सुरत-शब्दयोग की क्रिया बताई गई। भजन-भेद लेने के तीन महीने बाद 1940 ई0 के मार्च महीने में आप तीव्र वैराग्य के कारण किसी को बिना कुछ बताये अज्ञात पथ पर निकल पड़े। जमालपुर से क्यूल का टिकट लेकर आप रेल में बैठ गये। रास्ते में एक गैरिक वस्त्रधारी महात्मा मिले, जो देखने में बौद्ध भिक्षु लगते थे। उन्होने आपसे पूछा कि घर से भागकर आये हो? आने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया और कहा कि ‘देखिये, मेरे पास टिकट है।’ लेकिन महात्माजी समझ गये कि ये घर छोड़कर भाग रहे हैं। फिर आप क्यूल से पटना जानेवाली गाड़ी पर बिना टिकट लिये ही सवार हो गये। पटना में आपको रेल के अधिकारियों ने टिकट नहीं होने के कारण पकड़ लिया। लेकिन गाड़ी खुलने के कुछ पहले ही आपने एक सिपाही को कुछ पैसे देकर पुनः वहाँ से यात्रा आरम्भ कर दी। भ्रमण करते हुए आप चित्रकूट पहुँचे और मन्दाकिनी में स्नान किया। वहीं एक वृद्धा से सत्तू खरीदकर आपने क्षुधा शान्त की। पुनः वहाँ से हनुमान धारा पहुँचे और एक वृक्ष की छाया में बैठ गये। गाँव के कुछ लोग आप पर व्यंग्य करने लगे कि इस युवक को देखो, इस तरह माँगकर खाता है। उन्ही लोगों ने आपसे पूछा कि गेहूँ काटियेगा? आपने इनकार कर दिया। तब वहाँ से फिर घर आये और अपने षोकाकुल माता-पिता को आपने शान्त किया।

आप पुनः अपनी साधना के साथ-साथ आप कारखाने में नौकरी भी करते रहे और बीच-बीच में परमाराध्य के दर्शानार्थ छुट्टी लेकर कुप्पाघ्ज्ञाट जाया करते थे। सन् 1942 ई0 के अगस्त माह में आपकी उम्र साढ़े बीस वर्ष रही होगी, उसी समय आपकी पूजनीया माताजी 60 वर्ष की आयु में परलोक सिधार गईं। उसके पाँच वर्ष बाद सन् 1947 ई0 में अपने जीवन के लगभग 68 वर्ष पूरे करके आपके पूज्य पिताजी ने भी जगत् से मुक्ति पाई। माताजी की मृत्यु के बाद आप परमाराध्य के दर्शन के लिए सत्संग मन्दिर, परबत्ती (भागलपुर) गये। गुरू महाराज ने आपसे पूछा कि घर पर कौन-कौन हैं? इसके उत्तर में आपने माता की मृत्यु का संवाद सुनाया। गुरू महाराज ने कहा कि अच्छा ही हुआ कि माताजी का देहान्त हो गया। उस समय आप मातृ-वियोग से दुखी थे। गुरू महाराज के उत्तर से आपको बड़ा दुःख पहुँचा; परन्तु बाद में गुरू महाराज की रहस्मयी वाणी को आप समझ सके कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा था। आपने अपनी पैतृक सम्पत्ति में से केवल 40 डिसमल जमीन ली। उसमें आप सत्संग मन्दिर बनवाना चाहतें थे। इस पर गुरू महाराज ने कहने की कृपा की-‘‘मैं भी अपनी जन्मभूमि में रह रहा हूँ। तुम भी अपनी जन्मभूमि में रहो।’’ गुरू महाराज के कहने पर ही आपने नवम्बर, 1948 ई0 में बरईचक पाटम में सत्संग मन्दिर का निर्माण किया और ध्यान करने के लिए एक गुफा भी बनवाई। आपकी इस तपोभूमि में निर्मित गुफा का आज भी बड़ा महत्त्व है। एक बार परमाराध्य गुरूदेव ने प्रवचन के दौरान कहा था कि ‘एक समय ऐसा आयेगा, जब आपको कमाना नहीं पड़ेगा और खाने की कमी नहीं रहेगी।’ गुरू महाराज की इस अमोघ आषीर्वाद को फलित होता आज हम सभी देख रहे हैं। आज आश्रम का बहुत विस्तार हो चुका है और अतिथियों का आतिथ्य भी भली भाँति सम्पन्न हो रहा है।
10 फरवरी, 1981 ई0 में आपकोे हृदयाघाट हुआ था। अपनी इस बीमारी के दौरान आप कुप्पाघाट में एक महीने तक रहे थे और गुरू महाराज के रसोईघर से भोजन किया करते थे। हृदय रोग के कारण भोजन करने में आप बहुत परहेज किया करते थे। यह देखकर गुरूदेव ने आपसे कृपापूर्वक कहा था, ‘‘यह नहीं खायेंगे, वह नहीं खायेंगे, सबकुछ खाओ, मरोगे नहीं।’’ इस प्रकार गुरूदेव की कृपा से आपको अभयदान मिला था। आप अपना जीवन सद्गुरू महाराज के आदेष और उपदेष के अनुसार तथा सन्तमत के सिद्धान्तों का अक्षरषः पालन करते हुए व्यतीत कर रहे हैं। आपका जीवन एक संन्यासी का जीवन है, यद्यपि आपने काशाय वस्त्र धारण नहीं किया है। आपके दर्षन से मन को शान्ति का संबल मिलता है। परमाराध्य गुरूदेव से हमारी विनती है कि आप लम्बे समय तक स्वस्थ रहते हुए विषयों की ज्वाला में जलनेवाले मानव को त्राण दिलाते रहें।
गुरूदेव दानी तारण, सब भव व्यथा विरादन,
मम सकल काज सारन, अपना दरस दिखा दो ।।1।।
विषयों में ही मन लागे, सत्संग से हटि भागे,
मोको करो सभागे, सत्संग में लगा दो ।।2।।
जब जाप जपन लागूँ, तब ध्यान में जब पागूँ,
चिन्तन सभी तब त्यागूँ, ऐसी लगन लगा दो ।।3।।
दृष्टि अड़ै सुखमन में, मन मगन हो भजन में,
ललचे न कोउ रंग में, इक बिन्दु को धरा दो ।।4।।
जौं सूर्त दल सहस में, वा त्रिकुटी महल में,
चढि़ जाय तहँहुँ बिन्दु में मम दृष्टि को लगा दो ।।5।।
कोउ रूप को न देखूँ, इक बिन्दु सब में पेखूँ,
रिधि सिद्धि को न लेखूँ, ऐसी सुरत सिमटा दो ।।6।।
घण्ट षंख न नगारा, मुरली न बीन तारा,
की धुन में फँस रहूँ मैं, गुरू ऐसे ही बना दो। ।।7।।
धुन अनाहत की हो, घट-घट में जो सतत हो,
जो सार धुन अहत हो, तिस में सुरत लगा दो ।।8।।
जो जगत से विलक्षण, जिसमें न विषय लक्षण,
जो एक रस सकल क्षण, तिसमें मुझे रमा दो ।।9।।
गुरू शरण हूँ तुम्हारी, भावे करो हमारी,
एक आस है तिहारी, भव फन्द से छोड़ा दो ।।10।।
सब  अवगुणों से पूरे, हौं मैं गुरू जरूरे,
तुमसे न कुछ भी दूरे, औगुण सकल जला दो ।।11।।
    कपटी कपूत जौं हूँ, तुम्हारो कहाउँ तौ हूँ,
शरणी तिहार ही हूँ, चाहो सो मोहि बना दो। ।।12।।