श्रीदलबहादुर दासजी महाराज

पूज्यपाद स्वामी श्रीदलबहादुर दासजी महराज

बीसवी सदी के महान् सन्त ब्रहालीन पूज्यपाद सदगुरू महर्शि मेंहीं परमहंसजी महाराज के तपोनिश्ठ, आज्ञाकारी, समीपस्थ सेवक-शिष्य पूज्य स्वामी श्रीदलबहादुर दासजी महाराज का अवतरण विक्रमी संवत् ज्येष्ठ बारह (12)गते 1183 (सन् 1126 ई.)को नेपाल देश के नं. 1 धुरी खेल अड्डा राजाबासा पानंचे नामक ग्राम में हुआ था। स्वर्गीय   घनबहादुर दासजी को इनके पूज्य पिता होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ये सनातन धर्म के अनुयायी थे एवं माता स्वर्गीय माया देवी बहुत ही धर्मपरायणा थी। स्वामी श्रीदलबहादुर दासजी के पूज्य पिताजी जाति के मगर (वैश्य) थे। स्वामीजी के तीन भाई और दो बहनें है। भाइयों में ये मँझले ळें इनके बड़े भाई का नाम श्रीउदयबहादुर एवं छोटे भाई का पुकार का नाम कान्छा है। बड़ी बहन श्रीमती यशोधरा देवी एवं छोटी बहन का पुकार कान्छी है।

बाल्यावस्था और अध्ययनः बाल्यकाल में आपके घर के समीप कोई विधालय नही था, जिसके कारण आप विधालयीय शिक्षा से वंचित रहे, किन्तु आपके पूज्य दादाजी एवं पिताजी ने घर पर ही आपको रामायण व गीता पाठ करना सिखाया था। आपके दादाजी सनातनधर्मी थे, अतः रामायण और गीता में उनकी अधिक प्रीति थी। वे अपने पौत्र श्रीदलबहादुर दासजी को आध्यात्मिक संस्कार से सुसंस्कृत करना चाहते थे।

गीता में भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश है कि योग की पूर्णता न होने पर शरीर त्यागकर कुछ काल तक जीवात्मा स्वर्ग में रहती है। वहाँ का सुखोपभोग करने के पश्चात् किसी पवित्र श्रीमान् कुल में जन्म पाती है और पूर्व के आध्यात्मिक संस्कार से प्रेरित होकर पुनः योग-साधना में लग जाती है। पूज्य श्रीदलबहादुर दासजी में पूर्वजन्म का सुसंस्कार तो था ही, तभी तो इनका जन्म सद्धर्मी परिवार में हुआ। जब आप अपने ग्राम के निकटवर्ती जंगल में गौ चराने जाते थे, तो जंगल का मनोरम व एकांत स्थान आपके मन को बहुत भाता था। उस समय आप दीक्षित नही हुए थे, फिर भी अपने मन से किसी वृक्ष के नीचे आँखे बन्द करके चुपचाप बैठ जाते थे। आँखे बन्द करके आपको जो कुछ दीखता था, उससे आपको बड़ा आनन्द होता था। पूर्व के यौगिक संस्कारवश बराबर ध्यान में समय बिताते थे, लेकिन मन में जिज्ञासा होती थी कि आराधना - उपासना का मूल -भेद क्या है दिन -प्रतिदिन इस जिज्ञासा के निवारण के लिए चिन्तनशील रहा करते सोचा करते कि उपासना -विधि की उपलब्धि कैसे हो।

विक्रमी संवत् 2000 में आप अपने घर से चलकर मोरंग अपने चचेरे भाई श्रीकृशणबहादुरजी के पास आकर रहने लगे, जो वन विभाग में हवलादार थे। फिर आप भी वन विभाग में सिपाही के रूप में बहाल हो गये। इस पद पर विक्रम संवत् 2003 से 2007 तक रहे। उसके बाद विक्रम संवत् 2007 में ही पुलिस विभाग में चले गये। अपनी नौकरी के समय आप किसी दुकानदार के यहाँ से राशन लाते थे,उसी के यहाँ से भगवान् बुंद्ध की धम्मपद नामक पुस्तक मिली। इस पुस्तक की रोचक कथाओं को पढ़कर आपको आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने की स्वाभाविक प्रेरणा हुई। उसी पुस्तक के आवरण-पृष्ठ पर महर्शि मेंही परमहंसजी महाराज रचित सन्त -स्तुति सब सन्तन्ह की बडि़ बलिहारी छपी थी। आपने सत्संगी बृजलालदासजी को यह पुस्तक दिखाते हुए कहा कि यह पुस्तक तो बहुत अच्छी है, इसमें सभी सन्तों का समादर किया गया है। पुस्तक को देखते ही श्रीबृजलालदासजी बोले कि यह पुस्तक आप कहाँ से लाये यह तो सन्तमत की है सन्तमत-सत्संग में इसका पाठ होता है। इसमें लिखित सन्त-स्तुति हमारे गुरूदेव  महर्शि मे ही परमहंसजी महाराज की है। श्रीबृजलाल दासजी से सारा विवरण जानकर आपके मन में पूज्य महर्शिजी के दर्शन की अभिलाषा उत्पन्न हुई । पुलिस विभाग की नौकरी के दौरान आप श्रीसन्तमत- सत्संग आश्रम, सैदाबाद के व्यवस्थापक सतलोकवासी पूज्य श्रीलच्छन बाबा के पास सत्संग सुनने जाया करते थे। श्रीलच्छन बाबा ने ही आपको आश्वासन दिया था कि जब महर्शिजी सैदाबाद पधारेंगे, तब आपको भजन- भेद दिलवा दूँगा।

सौभाग्य से महर्शिजी के सैदाबाद पधारने का शुभ समाचार आपको शीघ्र ही  मिला और आप तत्काल आश्रम पहुँचे,गुरूदेव को प्रणाम निवेदित किया और दीक्षा की याचना की । गुरूदेव ने आपको सहर्श आत्म- साक्षात्कार का भेद बता दिया, जिसे भजन- भेद कहते हैं। यह विक्रम संवत् 2007 की बात है। दीक्षा पाकर आप पवित्र विधि से साधना करने लगे। अपने सहकर्मियों का रहन - सहन तथा खानपान आपको ठीक नही लगता था इसी कारण केन्द्र पर एक फूस की झोपड़ी बनाकर उसमें नियम से और निशठापूवर्क सांध्योपासना करने लगे। किसी आवश्यक कार्यवश आप एक महीने के लिए कही अन्यत्र चले गये थे । इसी अवधि में एक सब - इंसपेक्टर अपने दल के साथ गश्त करता हुआ सिक्टी चैकी पहुँचा। रात्रि विश्राम के लिए उन्हें वही ठहरना पड़ा। जिस कोठरी में आप रहते थे, उसी घर की दूसरी कोठी में सब - इंसपेक्टर साहब ने अन्य सिपाहियों के साथ विश्राम किया, किन्तु स्थानाभाव के कारण एक सिपाही को आपकी कोठ उसने रात्रि - स्वप्न में देखा कि एक महात्मा (पूज्य गुरूदेव की आकृति के महात्मा) ने आकर उसे जगा दिया है और वे कह रहे है कि जिस नियम -निष्ठा से वह (दलबहादुर दासजी) रहता है, उस तरह तुम नही रह सकोगे इसलिए तुम यहाँ से चले जाओ। सिपाही की नीद टूट गई और आश्चर्यचकित होता वह दूसरी जगहजाकर सो रहा । दूसरे दिन प्रात: काल उसने स्वप्न की बात अपने सहयोगियों को बताई। एक महीने बाद जब आप लौटे तो आपको भी यह आश्चर्यचकित कर देनेवाली स्वप्न की बात बताई गई।

इस घटना को सुनकर आपके ह्रदय में गुरू महाराज के प्रति अपार श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव जाग उठा। आप मन-ही-मन आश्वस्त हो गये कि सद्गुरूदेव प्रकट रूप में तो अपने शिष्यों की रक्षा तो करते ही है, लेकिन परम हितैशी की तरह परोक्ष रूप से भी अपने शिष्यों की नियम- निष्ठा को भंग होता नहीं देख सकते उसकी रक्षा के लिए स्वंय उपस्थित हो जाते है। इस तरह गुरू महाराज के प्रति आपके मन में आन्तरिक प्रेम का संचरण हुआ।
आपने भजन-भेद लेने के बाद पूज्य गुरूदेव से अपनी शरण में ले लेने की प्रार्थना की, गुरूदेव ने कहा कि या तो माता-पिता के जीवनोपरान्त आओ या उनकी आज्ञा लेकर आओ। आपने सोचा कि माता-पिता के जीवनोपरान्त कब गुरूदेव की शरण में जा सकेंगे या नही जा सकेंगे, यह सब तो अनिश्चित है, लिहाजा डेढ़ साल बाद जब पिताजी आयेंगे तो उन्हें अपनी सारी कमाई जमा पूँजी सौपकर उनसे आज्ञा ले लूँगा आप यह सब विचार ही रहे थे कि सावन माह में अचानक पिताजी का स्वर्गवास हो गया। पिता के निधन का यह समाचार अज्ञात कारणों से और अति विलम्ब से अगहन में आपको मिला । इसे भी आपने गुरूदेव की अहैतुकी कृपा ही माना,क्योकि यदि समय से पत्र मिल जाता तो घर जाना ही पड़ता। फिर घर जाने अविवाहित जीवन व्यतीत करते हुए गुरूदेव की शरण में जाना असम्भव हो जाता । पिताजी की मृत्यु का संवाद मिलने पर आपने वैदिक विधि से स्वयं को परिशुद्ध किया और अपने निवास में रात्रि में शयन किया। उसी रात आपने स्वप्न में गुरूदेव का दर्शन किया, जो आपको जगाकर कह रहे थे- उठो,चलो, इतना विलम्ब क्यों करते हो’ गुरूदेव का आदेश सुनकर आपकी नींद टूट गई और बहुत आश्चर्य हुआ । आपके जीवन की उनति के लिए सद्गुरूदेव की कृपा का यह अप्रतिम दृशटान्त है।
इसी बीच पूज्य गुरूदेव श्रीसन्तमत- सत्संग मन्दिर, सैदाबाद पधारे। गुरूदेव से षरण में लेने की आपने पुनः प्रार्थना की। गुरूदेव ने आपको अपनी षरण में ले लिया। वि. सं. 2011 में नौकरी से त्यागपत्र देकर आप गुरूदेव की सेवा में रहने लगे। पहले-पहल डेढ़ वर्श तक सैदाबाद आश्रम में रहे, उसके बाद सिकलीगढ़ धरहरा में पूज्य श्रीधर बाबा के साथ। एकान्तवास करते हुए साधना में संलग्न रहे। सिकलीगढ़ धरहरा में आप गढ़ पर रहकर बगीचे की देखभाल ,आम के वृक्षो की निकौनी ,सीका-बहँगी लेकर वृक्षों की सिंचाई करना, मजदूरो को भोजन देना, सत्संग भवन की लिपाई -पुताई के अनेक कार्य सेवा -भाव से करते रहे। अपने बहुत दिनों तक गुरू महाराज की रसोई भी बनाई। मनिहारी में भी आप बहुत दिनों तक गुरूदेव की सेवा में सन्द्ध रहे । मनिहारी के चयरमैन स्व. बलदेव पोझार आपके सम्बन्ध में कहा करते थे कि ‘‘ये जूता सिलाई से चण्डीपाठ तक किया करते हंै।’’ 
आपका चरित्र मानवता की तिमिरमयी रजनी का आलोक -स्तम्भ है। घर परिवार का परित्याग कर देना एक बात है और उसको स्मरण-प्रवाह और चित - प्रवाह से हटा देना दूसरी बात । जिस प्रकार स्वपनद्रश्टा जाग्रत अवस्था में स्वपन की बात को विस्मृत कर देता है, उसी प्रकार आपने अपने प्रिय कुटुम्बियों को विस्मृत कर दिया अर्थात् स्मरण और चित -प्रवाह से हटा दिया और संन्यास -पथ पर अग्रसर हुए। परिस्थितियों ने भी साथ दिया और महर्शिजी ने आपको गैरिक वस्त्र प्रदान किया । गैरिक वस्त्र धारण कर लेने के वर्शो बाद परमाराध्य देव ने दीक्षा देने का आदेष दिया। अबतक आपने 10000 लोगों को दीक्षा दी है। 
एक बार की बात है, नेपाल के सत्संगी मनिहारी आये और गुरू महाराज को संुघा कुटी की कुछ समस्याएँ बतायी। गुरू महारात ने समस्याओं के निबटारे के लिए आपको आदेष दिया कि सुंघा कुटी में ही रहकर इन समस्याओं का समाधान करें। इस पर मनिहारी के सत्संगियों ने गुरू महाराज से प्रार्थना की कि पूज्य बाबा मनिहारी आश्रम में भी रहें। तब गुरू महाराज ने आपको दोनां स्थानों पर रहने का आदेष दिया। गुरूदेव की आज्ञा के अनुसार आप ग्रीष्मकाल में सुंघा कुटी और वर्षाकाल में मनिहारी आश्रम में रहा करते हैं। जिस समय आप आराध्य देव की सेवा में रहते थे, उसी समय आपने निश्चय कर लिया था कि जबतक गुरूदेव शरीर में हैं, तबतक गुरूसेवा करूगां और उसके बाद साधनापूर्ण जीवन बिताऊँगा। पहला चरण 
था सेवा पट, दूसरा था साधना पट। आपने प्रतिदिन बारह घण्टे लगातार ध्यानाभ्यास करने का निष्चय किया और कुछ वर्षो तक इसी नियम से ध्यान-साधना करते रहे, लेकिन कुछ वर्षो के बाद सत्संग-प्रेमियों के आग्रह पर सत्संग-प्रचार के निमित्त इस कार्य-प्रणाली को स्थगित करना पड़ा। अब आप गुरू महाराज की प्रेरणा से सन्तमत के प्रचार-प्रसार के कार्य में प्राणपण से लगे हुए हैं।