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संतमत-सत्संग की स्तुति-विनती और आरती

(प्रात:कालीन ईश-स्तुति)

सब क्षेत्र अपरा परा, औरु अक्षर पार में।
​निर्गुण सगुण के पार में, सत् असत् हू के पार में।।1।।
सब नाम रूप के पार में, मन बुद्धि वच के पार में।
गो गुण विषय पॅंच में, गति भॉंति के हू पार में।।2।।
सूरत निरत के पार में, सब द्वन्द्व द्वैतन्ह पार में।
आहत अनाहत पार में, सारे प्रपन्चन्ह पार में।।3।।
सापेक्षता के पार में, त्रिपुटी कुटी के पार में।
अद्वय अनामय अमल अति, आधेयता गुण पार में।
सत्तास्वरूप अपार सर्वाधार मैं—तू पार में।।5।।
पुनि ओ3म् सोउहम् पार में, अरु सच्चिदानन्द पार में।
है अनन्त व्यापक व्याप्य जो, पुनि व्याप्य व्यापक पार में।।6।।
हैं हिरण्यार्भहु खर्व जासों, जों हैं सान्तह पार में।
सर्वेश हैं अखिलेश हैं, विश्वेश हैं सब पार में।।7।।
सत्शब्द धरकर चल मिलन, आवरण सारें पार में।
सद्गुरू करुण कर तर ठहर, धर 'मेॅंहीॅं' जावें पार में।।8।।

(प्रात: एवं सायंकालीन सन्त-स्तुति)

सब सन्तन्ह की बडि़ बलिहारी ।। टेक ।।
उनकी स्तुति केहि विधि कीजै,
मोरी मति अति नीच अनाड़ी ।। सब0।।
दुख-भंजन भव-फंदन-गंजन,
ज्ञान-ध्यान-निधि जग-उपकारी ।
विन्दु-ध्यान-विधि नाद-ध्यान-विधि ,
सरल-सरल जग में परचारी ।। सब0।।
धनि ॠषि-सन्तन्ह धन्य बुद्ध जी,
शंकर रामानन्द धन्य अघारी ।
धन्य हैं साहब सन्त कबीर जी,
धनि नानक गुरू महिमा भारी ।। सब0।।
गोस्वामी श्री तुलसि दास जी,
तुलसी साहब अति उपकारी ।
दादू सुन्दर सूर श्वपच रवि,
जगजीवन पलटू भयहारी ।। सब0।।
सतगुरू देवी अरू जे भये हैं,
होंगे सब चरणन शिरधरी ।
भजत है 'मेंहीं' धन्य-धन्य कहि,
गही सन्त-पद आशा सारी ।। सब0।।

(प्रात: कालीन गुरू-स्तुति)

मंगल मूरति सतगुरू, मिलवैं सर्वाधार।
मंगलमय मंगल करण, विनवौं बारम्बार।।1।।
ज्ञान-उद्धि अरू ज्ञान-धन, सतगुरू शंकर रूप।
नमों-नमों बहु बार हीं, सकल सुपूज्यन भूप ।।2।।
सकल भूल-ना’का प्रभू, सतगुरू परम कृपाल।
नमो कंज-पद युग पकडि़, सुनु प्रभु नजर निहाल।।3।।
दया-दृस्टि करि नाशियों , मेरो भूल अरू चूक।
खरो तीक्ष्ण बुधि मोंरि ना, पाणि जोंडि़ कहॅु कुक।।4।।
न्मो गुरू सतगुरू नमो, नमो-नमो गुरूदेव।
नमो गुरू सतगुरू नमों,निर्मल जाकों भेंव ।।5।।
ब्रह्म रूप् सतगुरू नमो, प्रभु सर्वे’वर रूप।
राम दिवाकर रूप गुरू, ना’का भ्रम-तम कूप।।6।।
नमो सुसाहब सतगुरू, विध्न विना’का द्याल।
सुबुधि विगासक ज्ञानप्रद, ना’का भ्रम-तम-जाल।।7।।
नमो-नमो सतगुरू नमो, जा सम कोउ न आन।
परम पुरूषहू तें अधिक, गावें सन्त सुजान।।8।।



छप्पय

जय जय परम प्रचण्ड, तेज तम-मोंह विनाशन।
जय जय तारण तारण, करन जन शुद्ध बुद्ध सन।।
जय जय बोध महान, आन कोउ सरवर नाही।
सुर नर लोकन माहिं, परम कीरति सब ठाहीं।।
सतगुरू परम उदार है, सकल जयति जय-जय करें।
तम अज्ञान महान अरू, भूल-चूक-भ्रम मम हरें।।1।।
जय जय ज्ञान अखण्ड, सूर्य भव-तिमिर विनाशन।
जय जय जय सुख रूप, सकल भव-त्रास हरासन।।
जय जय संसृति-रोग-सोग, को वैध श्रेष्ठतर।
जय जय परम कृपाल, सकल अज्ञान चुक हर।।
जय जय सतगुरू परम गुरू, अमित-अमित परणाम मैं।
नित्य करू सुमिरत रहूँ, प्रेम—सहित गुरूनाम में।।2।।
जयति भक्ति-भण्डार, ध्यान अरू ज्ञान-निकेतन।
योंग बतावनिहार, सरल जय-जय अति चेतन।।
क्रनहार बुधि तीव्र, जयति जय-जय गुरू पूरे।
जय-जय गुरू महाराज, उक्ति-दाता अति रूरे।।
जयति-जयति श्री सतगुरू, जोडि़ पाणि युग पद धरों।।3।।
भक्ति योग अरू ध्यान को, भेद बतावनिहारो।
श्रवण मनन निदिध्यास, सकल दरसावनिहारे।।
सतसंगति अरू सूक्ष्म वारता, देहिं बताई।
अकपट परमोदार न कछु, गुरू धरें छिपाई।।
जय-जय-जय सतगुरू सुखद, ज्ञान संपूरण अंग सम।
कृपा-दृष्टि करि हेरिये, हरिय युक्ति बेढंग मम।।4।।

(प्रात:कालीन नाम-संकीर्तन)
अव्यक्त अनादि अनन्त अजय,
अज आदि मूल परमातम जो।
ध्वनि प्रथम स्फुटित परा धारा, जिनसे कहिये स्फोट है सो।।
है स्फोट वही उद्गीथ वही, ब्रह्मनाद, ‘शब्दब्रह्म ओइम् वही।
अति मधुर प्रणव ध्वनि धार वही, है परमातम-प्रतीक वही।।
प्रभु का ध्वन्यात्मक नाम वही, है सारशब्द सतशब्द वही।
है सत् चेतन अव्यक्त वही, व्यक्तों में व्यापक नाम वही।
है सर्वव्यापिनि ध्वनि राम वही, सर्व-कर्षक हरि कृष्ण नाम वही।।
है परम प्रचण्डिनि शक्ति वही, है -शिव शंकर हर नाम वही।।
पुनि राम नाम है अगुण वही, चेतन ध्वनि-सिन्धु अदोष वही।।
स्वर-व्यंजन-रहित अघोष वही, चेतन ध्वनि-सिन्धु अदोष वही।।
है एक ओम् सत्नाम वही, ॠषि-सेवित प्रभु का नाम वही।।
X X X X X X X X मुनि-सेवित गुरू का नाम वही।
भजों उॅं उॅं प्रभु नाम वही, भजों उॅं उॅं मेंहीं नाम यही।।

(सन्तमत सिद्धान्त)
अव्यक्त अनादि अनन्त अजय,
1. जो परम तत्व आदि-अन्त-रहित, असीम, अजन्मा, अगोचर,
सर्वव्यापक और सर्वव्यापकता के भी परे है, उसे ही सर्वेश्वर-सर्वाधर
मानना चाहिए तथा अपरा (जड़) और परा चेतन्); दोनों प्रकृतियों
के पार में, अगुण और सगुण पर, अनादि- अनन्त-स्वरूपी, अपरम्पार
शक्तियुक्त, देशकालातीत, शब्दातीत, नाम-रूपातीत, अद्वितीय,मन-बुद्धि
और इन्द्रियों के परे जिस परम सत्ता पर यह सारा प्रकृति-मण्डल एक
महान् यंत्रा की नाई परिचालित होता रहता है, जो न व्यक्ति है और न
व्यक्त है, जो मायिक विस्तृतत्व-विहीन है, जो अपने से बाहर कुछ भी
अवकाश नहीं रखता है, जो परम सनातन, परम पुरातन एवं सर्वप्रथम
से विद्यमान है, सन्तमत में उसे ही परम अèयात्म-पद वा परम
आध्यात्मस्वरूपी परम प्रभु सर्वेश्वर (कुल्ल मालिक) मानते हैं।
2. जीवात्मा सर्वेश्वर का अभिन्न अंश है ।
3. शांति आदि-अन्त-सहित है और सृजित है ।
4. मायाबद्ध जीव आवागमन के चक्र में पड़ा रहता है ।
इस प्रकार रहना जीव के सब दु:खों का कारण है ।
इससे छुटकारा पाने के लिए सर्वेश्वर की भक्ति ही एकमात्र उपाय है ।
5. मानस जप, मानस, ध्यान, दृष्टि-साधन और सुरत- शब्द-योग
द्वारा सर्वेश्वर की भक्ति करके अन्ध्कार, प्रकाश और शब्द के
प्रकृति तीनों परदों से पार जाना और सर्वेश्वर से एकता का ज्ञान
प्राप्त करके मोक्ष पा लेने का मनुष्य-मात्रा अधिकारी है ।
6. झूठ बोलना, नशा खाना, व्यभिचार करना, हिंसा
करनी अर्थात् जीवों को दु:ख देना वा मत्स्य-मांस को
खाद्य पदार्थ समझना और चोरी करनी; इन पॉंचो महापापों
से मनुष्यों को अलग रहना चाहिए ।
7. एक सर्वेश्वर पर ही अचल विश्वास, पूर्ण भरोसा तथा अपने
अन्तर में ही उनकी प्राप्ति का दृढ़ निश्चय रखना, सद्गुरू की
निष्कपट सेवा, सत्संग और दृढ़ ध्यानाभ्यास इन पॉंचो
को मोक्ष का कारण समझना चाहिए ।


7

अति अटल श्रद्धा प्रेम से, गुरू-भक्ति करनी चाहिए ।।
मृग-वारि सम सब ही प्रपंचन्ह, विषय सब दुख रूप हैं ।
निज सुरत को इनसे हटा, प्रभु में लगाना चाहिए ।।
अव्यक्त व्यापक व्याप्य पर जो, राजते सबके परे ।
उस अज अनादि अनन्त प्रभु में, प्रेम करना चाहिए ।।
जीवात्म प्रभु का अंश है, जस अंश नभ को देखिये ।
घट मठ प्रपंचन्ह जब मिटैं, नहिं अंश कहना चाहिए ।।
ये प्रकृति द्वय उत्पति-लय, होवैं प्रभू की मौज से ।
ये अजा अनाद्या स्वयं हैं, हरगिज न कहना चाहिए ।।
आवागमन सम दु:ख दूजा, है नहीं जग में कोई ।
इसके निवारण के लिए, प्रभु-भक्ति करनी चाहिए ।।
जितने मनुष तनधरि हैं, प्रभु-भक्ति कर सकते सभी ।
अन्तर व बाहर भक्ति कर, घट-पट हटाना चाहिए ।।
गुरू जाप मानस èयान मानस, कीजिये दृढ़ साधकर ।
इनका प्रथम अभ्यास कर, स्त्रुत शुद्ध करना चाहिए ।।
घट-तम प्रकाश व शब्द पट त्राय, जीव पर हैं छा रहे ।
कर दृष्टि अरू ध्वनि-योग-साध्न, ये हटाना चाहिए ।।
इनके हटे माया हटेगी, प्रभु से होगी एकता ।
पिफर द्वैतता नहिं कुछ रहेगी, अस मनन दृढ़ चाहिए ।।
पाखण्ड अरू¿हंकार तजि, निष्कपट हो अरू दीन हो ।
सब कुछ समर्पण कर गुरू की, सेव करनी चाहिए ।।
सत्संग नित अरू ध्यान नित, रहिये करत संलग्न हो ।
व्यभिचार चोरी नशा हिंसा, झूठ तजना चाहिए ।।
सब सन्तमत सि¼ान्त ये सब, सन्त दृढ़ हैं कर दिये ।
इन अमल थिर सिद्धान्त को, दृढ़ याद रखना चाहिए ।।
यह सार है सिद्धान्त सबका, सत्य गुरू को सेवना ।
'मेही' न हो कुछ यहि बिना, गुरू सेव करनी चाहिए ।।

(संतमत की परिभाषा)
(१) शांति स्थिरता वा निश्चलता को कहते हैं !
(२) शांति को जो प्राप्त कर लेते हैं, संत कहलाते हैं |
(३) संतो के मत वा धर्म को संतमत कहते है |
(४) शांति प्राप्त करने का प्रेरण मनुस्यों के ह्रदय में स्वाभाविक ही हैं |
प्राचीन काल में ऋषियों इसी प्रेरण से प्रेरित होकर इसकी पूरी खोज की और इसकी प्राप्ति के विचारों को उपनिषदों में वर्णन किया | इन्हीं विचारों से मिलते हुऐ विचारोें को कबीर साहब और गुरु नानक साहब आदि संतों ने भी भारती और पंजाबी आदि भाषाओँ में सर्व-साधारण के उपकारार्थ वर्णन किया | इन विचारों को ही, संतमत कहते हैं; परन्तु संतमत की मूल भित्ति तो उपनिषद के वाक्यों को ही मानने पड़ते हैं; क्योंकि जिस ऊँचें ज्ञान का तथा उस ज्ञान के पद तक पहुँचाने के जिस विशेष साधन-नादानुसन्धान अर्थात सूरत-शब्द-योग का गौरव संतमत को हैं, वे तो अति प्राचीन काल की इसी भित्ति पर अंकित होकर जगमगा रहे हैं | भिन्न-भिन्न काल तथा देशों में संतो के प्रकट होने के कारण तथा इनके भिन्न - भिन्न नामो पर इनके अनुयायियों - द्वारा संतमत के भिन्न-भिन्न नामकरण होने के कारण संतों के मत में पृथकत्व ज्ञात होता हैं; परन्तु यदि मोटी और बाहरी बातों को तथा पन्थायी भावों को हटाकर विचारा जाय और संतों के मूल एवं सार विचारों को ग्रहण किया जाय, तो, यही सिद्ध होगा कि सब संतों का एक ही मत हैं |

(अपराहन एवं सायंकालीन विनती)
प्रेम-भक्ति गुरू दीजिये, विनवौं कर जोड़ी ।
पल-पल छोह न छोडि़ये, सुनिये गुरू मोरी ।।1।।
युग-युगान खानि में, भ्रमि-भ्रमि दुख भूरी ।
पाएउ पुनि अजहू नहिं, रहु इन्हतें दूरी ।।2।।
पल-पल मन माया रमे, कभु विलग न होता ।
भक्ति-भेद बिसरा रहे, दुख सहि-सहि रोता ।।3।।
गुरू दयाल दया करी, दिये भेद बताई ।
महा अभागी जीव के, दिये भाग जगाई ।।4।।
पर निज बल कछु नाहिं है, जेहि बने कमाई ।
सो बल तबहीं पावउॅं, गुरू होय¡ सहाई ।।5।।
दृष्टि टिकै स्रुति धुनि रमै, अस करू गुरू दाया ।
भजन में मन ऐसो रमै, जस रम सो माया ।।6।।
जोत जगे धुनि सुनि पड़ै, स्रुति चढ़ै अकाशा ।
सार धुन्न में लीन होइ, लहे निज घर वासा ।।7।।
निजपन की जत कल्पना, सब जाय मिटाई ।
मनसा वाचा कर्मणा, रहे तुम में समाई ।।8।।
आस त्रासा जग के सबै, सब वैर व नेहू ।
सकल भुलै एके रहे, गुरू तुम पद स्नेहू ।।9।।
काम क्राेध मद लोभ के, नहिं वेग सतावै ।
सब प्यारा परिवार अरू, सम्पति नहिं भावै ।।10।।
गुरू ऐसी करिये दया, अति होइ सहाई ।
चरण-शरण होइ कहत हौं, लीजै अपनाई ।।11।।
तुम्हरे जोत-स्वरूप अरू, तुम्हरे धुन-रूपा ।
परखत रहू¡ नि-िश-दिन गुरू, करू दया अनूपा ।।12।।
(आरती)
आरति संग सतगुरू के कीजै ।
अन्तर जोत होत लख लीजै ।।
पांच तत्व तन अग्नि जराई ।
दीपक चास प्रकाश करीजै ।।
गगन-थाल रवि-राशि फल-फूला
मूल कपूर कलश धर दीजै ।।
अच्छत नभ तारे मुक्ताहल ।
पोहप माल हिय हार गुहीजै ।।
सेत पान मिष्टान्न मिठाई ।
चन्दन धुप दीप सब चीजैं ।।
झलक झॉंझ मन मीन म¡जीरा ।
मधुर-मधुर धुनि मृदंग सुनीजै ।।
सर्व सुगन्ध् उडि़ चली अकाशा ।
मधुकर कमल केलि ध्ुनि ध्ीजै ।।
निर्मल जोत जरत घट माहीं ।
देखत दृष्टि दोष सब छीजै ।।
अधर-धर अमृत बहि आवै ।
सतमत-द्वार अमर रस भीजै ।।
पी-पी होय सुरत मतवाली ।
चढि़-चढि़ उमगि अमीरस रीझै ।।
कोट भान छवि तेज उजाली ।
अलख पार लखि लाग लगीजै ।।
छिन-छिन सुरत अध्र पर राखै ।
गुरू-परसाद अगम रस पीजै ।।
दमकत कड़क-कड़क गुरू-धमा ।
उलटि अलल 'तुलसी' तन तीजै ।।
(11)
आरति तन-मन्दिर में कीजै ।
दृष्टि युगल कर सन्मुख दीजै ।।
चमके बिन्दु सूक्ष्म अति उज्ज्वल ।
ब्रãजोति अनुपम लख लीजै ।।
जगमग जगमग रूप ब्रãण्डा ।
निरखि निरखि जोती तज दीजै ।।
शब्द सुरत अभ्यास सरलतर ।
करि करि सार शबद गहि लीजै ।।
ऐसी जुगति काया गढ़ त्यागि ।
भव-भ्रम-भेद सकल मल छीजै ।।
भव-खण्डन आरति यह निर्मल ।
करि 'मेही अमृत रस पीजै ।।

(12)

(गुरू-संकीर्तन)

भजु मन सतगुरू सतगुरू सतगुरू जी ।। टेक ।।
जीव चेतावन हंस उबारन,
भव भय टारन सतगुरू जी ।। भजु0।।
भ्रम तम नाशन ज्ञान प्रकाशन,
हृदय विगासन सतगुरू जी ।। भजु0।।
आत्म अनात्म विचार बुझावन,
परम सुहावन सतगुरू जी ।। भजु0।।
सगुण अगुणहिं अनात्म बतावन,
पार आत्म कहैं सतगुरू जी ।। भजु0।।
मल अनात्म ते सुरत छोड़वान,
द्वैत मिटावन सतगुरू जी ।। भजु0।।
पिण्ड ब्रह्माण्ड के भेद बतावन,
सुरत छोड़वान सतगुरू जी ।। भजु0।।
गुरू-सेवा सत्संग दृढ़वान,
पाप निषेधन सतगुरू जी ।। भजु0।।
सुरत-शब्द-मारग दरसावन,
संकट टारन सतगुरू जी ।। भजु0।।
ज्ञान विराग विवेक के दाता,
अनहद राता सतगुरू जी ।। भजु0।।
अविरल भक्ति विशुद्ध के दानी,
परम विज्ञानी सतगुरू जी ।। भजु0।।
प्रेम दान दो प्रेम के दाता,
पद राता रहें सतगुरू जी ।। भजु0।।
निर्मल युग कर जोडि़ के विनवौं,
घट-पट खोलिय सतगुरू जी ।। भजु0।।