संत शाही स्वामी जी महाराज

सतलोकवासी पूज्य श्री श्रीधर दासजी महराज
पूज्य बाबा श्री श्रीधर दासजी महाराज का अवतरण सन् 1881 ई0 के भाद्र मास में भरसुरिया क्षेत्रिय कुल में हुआ था। इनका जन्मस्थान बिहार राज्य के समस्तीपुर जिलान्तर्गत सिंघिया प्रखण्ड का लगमा नामक ग्राम है। इनके पिता स्व0 जगदम्बी सिंहजी छोटी रियासत के वंशज थे। वे धार्मिक प्रवृति के थे। जीविकोपार्जन मुख्यता कृषि कार्य से होता था। उनकी माता स्व0 वासरानी देवी सरल ह्रदय की और धर्मपरायण थीं। ये तीन भाई थे और एक बहन थीं। ये भाईयों मेंसबसे छोटे थे तथा बहन इनसे भी छोटी थीं। माता- पिता ने बड़े लाड़- प्यार से इनका पालन -पोषण किया था और घर का नाम दिया था शिवधर। कालान्तर में इनके ग्रामीण संन्यासी गुरू ने इनका नाम’ श्रीधर’रख दिया। इनके बड़े भाई बाबू श्री बच्चन सिंहजी तथा मँझले भाई बाबू श्री जलधर सिंहजी गृहस्थ- जीवन व्यतीत करते थे। बड़े भाई निःसंतान थे। मँझले भाई को दो पुत्रियाँ थीं। किन्तु इन्होंने ब्रहा्रचर्य का व्रत धारण कर लिया था और आजीवन ब्रहा्रचारी रहे। पाँच वर्ष की अवस्था में इनका विधिवत्र मुण्डन - संस्कार और बारह वर्ष की अवस्था में उपनयन संस्कार हुआ। उस समय इनके गाँव में मात्र चैथे वर्ग तक का ही विधालय था। आस- पास के गाँवों में भी ऊँची कक्षा का विधालय कहीं नहीं था, अतः इनकी शिक्षा चैथे वर्ग तक ही हो सकी। ये पढ़ने में कुशाग्र बुद्धि के थे। बाल्यकाल से ही इनमें आध्यात्मिक प्रवृति दृष्टिगोचर होती थी। मात्र 24 वर्ष की अवस्था में इनके मन में देशाटन करने की इच्छा जाग्रत हुई] अतः घर छोड़कर बम्बई, कलकता, नारायणगंज] बालिंदा] गंगासागर] जगत्राथपुरी गये। बालिन्दा में एक अँग्रेज नहापीठ साहब के यहाँ कुछ दिनों तक दरबान का काम करते रहे, फिर वहाँ से लौट आये। 
सन्र 1917 ई0 में मधेपुरा जिलान्तर्गत आलमनगर प्रखण्ड के सिंघारा गाँव चले आये और वहाँ अपनी चचेरी बहन के घर पर वर्षो रहकर उनके पुत्र को पढ़ाते रहे। 1918 ई0 से 1920 ई0 तक उदाकिशुनगंज थाने के गंगोरा- झलाड़ी नामक ग्राम में बच्चों को पढ़ाया। उसके बाद कुमारखण्ड में भी बच्चों को शिक्षा देते रहे। वहीं इन्हें पता चला कि देवैल गाँव में एक साधु आये हैं। ये साधु कोई और नहीं] परमाराध्य सद्गुरू मर्हिर्ष मे ँही ँपरमहंसजी महाराज थे। इनके दर्शन व प्रवचन से इन्हें बहुत प्रसन्नता हुई। कुछ दिनों के बाद सिकलीगढ़- धरहरा आकर एक मारवाड़ी सज्जन के कारोबार की देखभाल करने लगे। उस समय महर्षिजी धरहरा में ही एक कुटी बनाकर रहते थे। पूर्वपरिचित होने के कारण श्री श्रीधर बाबा महर्षिजी के पास आया -जाया करते थे। सन्त कबीर की वाणी हैः 
कबीर संगत साधु की, ज्यों गन्धी का वास।
जो कुछ गन्धी दे नहीं,तो भी वास- सुवास।।
बराबर उनके पास आने- जाने से ये महर्षिजी के विचार से प्रभावित हुए और सन् 1928 ई0 में मानस जप] मानस ध्यान] दृष्टियोग और शब्दयोग की क्रिया उनसे प्राप्त की । सिकलीगढ़- धरहरा से चलकर ये तिलकपुर आ गये] जो भागलपुर और सुलतानगंज के बीच में पड़ता है। तिलकपुर में ये एक वर्ष तक ठाकुरवाड़ी में रहे। इन्होंने महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गये सत्याग्रह आन्दोलन में भी भाग लिया। इसी दौरान ये 2 महीने तक भागलपुर जेल में रहे। जेल से मुक्त होकर ये जतीर्थयात्रा में वैधनाथ धाम आये, तत्पश्चात् अपने गाँव लौटकर इन्होंने गा्रमीण जन को यह जानकारी दी कि सन्तमत- सत्संग का र्वािर्षक महाधिवेशन संताल परगना के रमला नामक ग्राम में 15,16,17 जनवरी,1933 ई0 को होने जा रहा है, जिसमें पूज्यवाद सद्गुरू महर्षि मे ँही ँ परमहंसजी महराज पधार रहे हैं। ग्रामीणों के साथ इन्हांेने सत्संग में सक्रिय रूप से भाग लिया। वही सद्गुरू महाराज के पुनः दर्शन हुए और उनकी निकटता का दुर्लभ संयोग प्राप्त हुआ। सन् 1933 ई0 में महर्षिजी के साथ  इन्होंने मुरादाबाद की यात्रा की, वहाँ सर्वधर्म -सम्मेलन था। महर्षिजी के प्रवचन से श्रोताओं को अतुलित आनन्द हुआ। वहाँ से महर्षिजी के साथ लौटकर कुप्पाघाट चले आये और वहीं की गुफा में सफाई करके साधना आरम्भ कीं उन दिनों ये गुरूदेव के लिए रसोई बनाया करते थे। एक दिन गुरूदेव ने इनसे कहर कि आप भी शब्द-साधना कीजिये और जो शब्द अन्तर में सुनाई दें, उन्हें लिखते जाइये।
       कुछ दिनों बाद ये गुरूदेव के आदेश से धरहरा चले आये। सन्1935 ई0 में गुरूदेव ने इनको स्थायी रूप से धरहरा आश्रम में रहने का आदेश दिया। ये आश्रम के लिए  धीरे-धीरे जमीन खरीदते गये। एक बार गुरूदेव ने कहा कि ‘श्रीधरजी! ठतनी जमीन साधु के लिए ठिक नहीं, रात-दिन जब गृहस्थ की तरह काम करेंगे तो ध्यान-सत्संग में विशेष समय नहीं दे सकेंगे। इससे क्या फायदा होगा। आपने घर का परित्याग किसके निमित्त किया है और क्या कर रहे हैं?’ इसपर पूज्य श्रीबाबा बोले-‘‘ हुजूर! आपन’ के जन्मस्थान यहाँ पड़य छै, कतेक साधु-महातमा यहाँ नी अइतै और रहतै, की खैयते? ’’ तब गुरू महाराज कुछ नहीं बोले। इन्होंने परिश्रम करके आश्रम के नाम पर 45 बीघा जमीन खरीदी थी। गोशाला में कई-कई गायें पालते और खेती करते। सन्1940 ई0 में इन्होंने अपने गाँव में गुरूदेव की उपस्थिति में सत्संग कराया था। पूज्य श्रीधर बाबा की माताजी गुरूदेव से प्रार्थना कने लगीं कि इन्हें घ पर रहने का आदेश देन की कृपा की जाय। तब गुरू महाराज ने इन्हें घर पर रहने की आज्ञा दी, लेकिन ये कुछ ही दिन घर पर रहकर धरहरा आश्रम लौट आये। सन् 1945 ई0 में इनके घ्ज्ञर से पत्र द्वारा सूचना आई कि माताजी मरणासत्र हैं, तत्काल घर पहुँचें। गुरूदेव की आज्ञा लेकर ये घर गये, किन्तु तबतक माताजी शरीर छोड़ चुकी थीं। जीवितावस्था में अपनी माता के दर्शन इन्हें नहीं हो सके।
        सन् 1949 ई0 में अखिल भारतीय साधु समाज का सम्मेलन गुजरात में हो रहा था, उसमें महर्षिजी को आमंत्रित किया गया था। उस समय परमाराध्य देव अस्वस्थ थे, इसलिए पूज्य श्रीधर बाबा को अपना प्रतिनिधि बनाकर और साथ में श्रीसन्तसेवीजी महाराज को गैरिक वस्त्र देकर उन्होंने सम्मेलन में भाग लेने के लिए भेजा। इसपर पूज्य श्रीधर बाबा बोले,‘‘हूजूर! आपको निमत्रण है।’’ गुरूदेव ने उत्तर दिया, ‘‘ जाओ, जो में  ँही ँ है, वही श्रीधर है, मुझमें और आपमें कोई भेद नहीं है। ’’
         सन् 1950 ई0 में गुरूदेव ने इनको सिकलीगढ-धरहरा आश्रम का स्थायी व्यवस्थापक बना दिया। ये बहुत ही कुशाग्र बुद्धि के थे। बहुतेरे शास्त्रोक्त वचन इन्हें कण्ठस्थ थे। इनके प्रवचनों में भाषा का आलंकारिक प्रयोग नहीं होता था, बल्कि वह अत्यन्त सरल और सुगम होती थी, जिसे अनपढ़ लोग भी आसानी से समझा जाते थे। इनकी प्रवचन-शैली गरू महाराज की शैली से मिलती थी। पूज्य गुरूदेव ने पहली बार सन् 1966 ई0 मे 5 दीक्षकों को नियुक्त किया था, जिनमें पूज्य श्रीधर बाबा, पूज्य शाही स्वामीजी महाराज, पूज्य लच्छन बाबा, स्वामी विष्णुकान्त झा और स्वामी गंगाराम ठाकुर थे। ये प्रचार-प्रसार में बाहर अधिक नहीं जाते थें। लोगोें के बहुत आग्रह करने पर इन्हें बाध्य होकर जाना पड़ता था। इसलिए इन्होंने मात्र 10,000 लोगों को ही दीक्षित किया।
          सन् 1982 ई0 में पटना में इनके बायें हार्निया का आॅपरेशन किया गया था और 1983 में दायें हार्निया का। कुछ दिनों के बाद इनकी छाती, पीठ और तलवे में जलन होने लगी। बहुत चिकित्सा के बाद भी जलन शान्त नहीं हुई। ये गरूदेव के अन्तिम दर्शन के लिए कुप्पाघाट आये और यहीं रहने लगे। मुरूदेव के परिनिर्वाण प्राप्त करने के उपरान्त ये बराबर शान्त और अन्तर्मुख रहने लगे। 24 जनवरी, 1987 ई0 को इन्होंने अन्न-जल का परित्याग कर दिया और 25 जनवरी, 1987 ई0 को अपने पार्थिव शरीर का त्याग कर त्यलोकवासी हो गये। महर्षि मे ँहा ँआश्रम, कुप्पाघाट के पश्चिम ओर गंगा के किनारे इनके पार्थिव शरीर का दाह-संस्कार किया गया। 25 जनवरी को कुप्पाघाट में और 25 फरवरी, 1987 ई0 को सिकलीगढ़ धरहरा में विशाल भण्डारे का आयोजन किया गया। जिस स्थान पर इनका दाह-संस्कार किया गया था,  वहाँ एक भव स्मारक का निर्माण कराया गया, जिसकी देखभाल इनके मुख्य सेवक स्व0 सच्चिदानन्द बाबा तथा सहायक विदेश्वरी दासजी करते रहे। पूज्य श्रीधर बाबा गुरूदेव के परम आज्ञाकरी, तपोनिष्ठ, कर्मयोगी। शिष्य थे। आज भी लोग इनका नाम आदर और श्रद्धा से लेते हैं। 
         इनके नाम से दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं-1. महर्षि मे ँहा ँ-पदावली: शब्दार्थ और भावार्थ सहित, 2. अमीघूँट (प्रवचन-संग्रह)
         श्रीधर बाबा विश्व-विभूति-विभूषक थे इस शान्तिमय भूखण्ड के कान्तिमय कालखण्ड में सन्तमत- सत्संग के पुनीत अवसर पर उनकी भव्य मूर्ति एवं हर्षोत्फल्ल आकृति को अपने बीच पाकर सन्तमत के उपासक  प्रसन्नातिरेक से विहल हो उठते थे। स्वाति-घन-विकल-चातक-तृषा-तृप्ति-निर्धनता-निहित-निधि-प्राप्ति तथा मुमुक्ष-ब्रहा-साक्षात्कृति की तरह उनके दर्शन अलौकिक आत्म-संबल-संवर्धन के कारण होते थे। वे आध्यात्म-क्षेत्र में सारस्वत-सम्पत्ति-सम्पन्न थे। शैशव-जीवन की प्रथम पंक्ति मं ही विविध विद्या-व्यवसाय- रूचि, सर्वतोमुखी शिक्षा-स्रोत-संचार-गति, व्यापक शास्त्रनुरक्ति, निर्विकल्प नीति-नति, सकल समाज-संगीति, योगिजन-स्तुति, अहिंसा-शक्ति, सत्याभिव्यक्ति, धर्म-रति, परमात्म-प्रीति तथा कत्र्तव्य-भक्ति की भावना से भरपूर हो, उनकी गौरव-गाथा का गान, अतीत-संस्कृति-भित्ति-संरक्षक, भविष्य-भूति-परिचायक, कृति-निदेशक,  प्रशस्तेतिहास-युक्ति-पोषक, दिव्य-दृष्टि दायक एवं निखिल-युग-ज्योति-प्रसारक थे।
          पूज्य श्रीधर बाबा महर्षि मे ँहा ँ परमहंसजी महाराज के सर्वश्रेष्ठ शिष्य थे। वे तापस-तत्त्व-तार्किक थे। भोग-विमुख एवं योग-सम्मुख होने के बाद ही तेजस्विता का आमुख प्रस्तुत होता है और मानवता-पोषण, सज्जनतानुसरण, शान्ति-निर्वहन, न्यायानुकरण तथा ब्रहा-तत्त्व-निरूपण की पृष्ठभूमि बनती है। इस क्रम में मायिक विभ्रम-मुक्त तथा क्लिष्ट-तप-श्रम-युक्त होकर उन्होंने जो सर्वांगीण सफलता पाई, वह अगणित कण्ठ-गेय, सन्त-पथानुयायी-स्वरादेय एवं पूर्ण श्रेय की वस्तु है।