संत सेवी जी महाराज

पूज्यपाद स्वामी श्रीसन्तसेवीजी महाराज

जन्मतिथि, जन्मस्थान, सद्गुरू महर्षि मेंहीं  परमहंसजी महाराज के परम अन्तरंग षिश्य स्वामी श्रीसन्तसेवीजी महाराज का अवतरण बिहार राज्य के मधेपुरा जिलान्तर्गत गमहरिया नामक ग्राम में 20 दिसम्बर, 1920 ई0 को हुआ था।

  माता-पिता, भाई-बहन, श्री बलदेवलाल दासजी को इनके पूज्य पिता होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जो कायस्थ कुल के वंशज थे। इनकी माता श्रीमती राधा देवी बहुत ही धर्मपरायणा थीं। चार भाइयों में ये कनिष्ठ हैं, इनसे छोटी एक बहन है। बड़े भाई थे श्रीयदुनन्दनलाल दास, श्रीरघ्ज्ञुनन्दनलाल और श्रीभेलालाल दासजी थे। ज्येश्ठ  भ्राजा के बाद के दोनों भाई युवावस्था में ही काल-कवलित हो गये। पूज्य स्वामी श्रीसंतसेवीजी महाराज का बाल्यावस्था का नाम श्री महावीरलाल दासजी था और इनकी छोटी बहन का नाम श्रीमती सीता देवी है। बीच के दोनों भाई सन्तमत में दीक्षित थे। दिसम्बर, 1981 ई0 मं इनके सबसे बड़े भाई 84 वर्ष की उम्र में दिवंगत हुए।
    शैशव एवं बाल्यावस्था, ममता की मंजूशा, वात्सल्य की वाटिका, स्नेह के सदन माता के आँचल की सुख-छाया में बालक महावीर का लालन-पालन होने लगा। शिशु का नामकरण पण्डितों द्वारा महावीर रखा गया। किसने जाना होगा किय ये भविष्य में विलक्षण मेधा और आश्चर्यजनक प्रतिभा के महान विद्वान् होंगे। बाल्यकाल में पण्डितों ने सरस्वती की पूजा-आराधना करके कैथी लिपि के अक्षरों का बोध कराया। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रामीण स्कूल गम्हरिया से षुरू हुई। मिडिल स्कूल की पढ़ाई के लिए बभनी गाँव जाया करते थे। ये बहुत ही कुषाग्र बुद्धि के थे, अपनी कक्षा में कभी प्रथम, तो कभी द्वितीय स्थान प्राप्त करते रहे।
आध्यात्मिक प्रवृति: ये बचपन से ही देवाधिदेव षंकर की आराधना किया करते थे। अपने गाँव से कुछ दुरी पर स्थित प्रसिद्ध सिंहेष्वर स्थान जल चढ़ाने यदा-कदा जाया करते थे। बजरंग बली के प्रति भी इनकी श्रद्धा-भक्ति थी। नित्यप्रति हनुमान-चालीसा, रामचरितमानस तथा राधेष्यामकृत रामायण का सस्वर पाठ किया करते थे। श्रीमद्भागवत में इनकी रूचि थी। सगुण के प्रति अपने झुकाव के बावजूद कबीर साहब और गुरू नानक साहब की निर्गुण विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित थे।
अध्यापन और चिकित्सा कार्य: दो बड़े भाई और चाचा के आकस्मिक निधन से इनके सामने आर्थिक समस्याएँ आ खड़ी हुई। स्वावलम्बी जीवन बिताने के उदेश्य से इन्होंने सन् 1938 ई0 में अपने घर का परित्याग कर गम्हरिया गाँव से 4 मील की दूरी पर स्थित राजपुर गाँव में श्रीलक्ष्मीकान्त झा जी के घर पर उनके तथा अन्य लड़कों को पढ़ाया करते थे। एक योग्य षिक्षक समझकर श्री झाजी इनका बहुत आदर-सम्मान करते थे। इस तरह अध्यापन में एक वर्श बीत गया। एक ही स्थान पर बहुत दिनों तक रहने से इनको नीरसता का अनुभव होने लगा। कुछ ही दिनों बाद ये नेपाल के मोरंग जिलान्तर्गत राजावासा स्थान पर चले गये और वहाँ अध्यापन के साथ-साथ होम्यापैथी पद्धति से चिकित्सा आरम्भ कर दी। यह चिकित्स उनकी उस करूणा का परिणाम थी, जो उस क्षेत्र के बीमार-लाचार लोगों को देखकर उमड़ी थी। कुछ दिनों बाद इनकी नियुक्ति पूर्णियाँ जिलान्तर्गत सैदाबाद के एक प्राथमिक विद्यालय में हुई। यहाँ भी इन्होंने अध्यापन के साथ-साथ अपनी चिकित्सा-सेवा जारी रखी।
वैराग्य: जीवन की क्षणभंगुरता और संसार की अनित्यता ने इनके मन में वैराग्य-भाव को जन्म दिया जो क्रमशः प्रबलतर होता गया। साधु-महात्माओं से लगाव के कारण परिवारवाले चिंतित रहने लगे थे। इनके बड़े भई श्री यदुनन्दनलाल दासजी इन्हें पारिवारिक जीवन में बाँधने के लिए बार-बार स्नेहपूर्वक आग्रह करते रहे। परन्तु गृहस्थ-जीवन व्यतीत करने की इच्छा इनके मन में कभी भी जाग्रत नहीं हुई। प्रत्येक मनुश्य की वर्तमान कार्य-पद्धति व विचार उसके पूर्वजन्म के संस्कारों से जुडऋी रहती है। कारण तो संस्कार है, घटना कार्य।
सद्गुरू महर्शिजी के प्रथम दर्षन व दीक्षा, सैदाबाद से कुछ मील की दूरी पर कनखुदिया नामक ग्राम में सन् 1939 ई0 के मार्च महीने में मास -ध्यान-साधना के अवसर पर महर्षिजी का इन्हें प्रथम दर्शन मिला। इन्होंने परमाराध्य गुरूदेव को प्रणाम निवेदित किया परमाराध्य ने भी इन्हें एकटक गौर से देखा। परमाराध्य की अन्तभेंदी दृश्टि से इनके मन में अपूर्व शान्ति का अनुभव हुआ और व्याकुल मन को व्याकुलता-निवारण का संवल भी मिल गया।
अपराहकाल सत्संग के उपरान्त परमाराध्य गुरूदेव कुछ विद्वानों के साथ टहल रहे थे। ये भी इनके पीछे हो लिए। वात्र्तालाप के क्रम में एक विद्वान् सज्जन परमाराध्य से बोले कि वर्णात्मक षब्द लिखे जाते हैं, ध्वन्यात्मक नहीं। ये बोल उठे- ‘‘कुछ वर्णात्मक षब्द भी लिखे नहीं जाते।’’ इसपर विद्वान् सज्जन ने पूछा- ‘‘ ऐसे कौन-से वर्णात्मक षब्द हैं? ’’ इन्होंने मिथिला में प्रचलित कुछ बोलियों का उदाहरण प्रस्तुत किया। इनकी मेधा से विद्वान् सज्जन प्रभावित हुए और गुरूदेव ने भी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इनका परिचय पूछा।
29 मार्च 1939 ई0 को पूज्यपाद महर्षि मेंहीं  परमहंसजी महाराज ने इन्हें मास ध्यान साधना के अवसर पर कनखुदिया ग्राम में दीक्षा दी। पूरे मास ध्यान में  रहकर इन्होंने भी साधना की। पूर्वजन्मों के संस्कारों से और गुरूदेव की कृपा से ध्यानाभ्यास में इनका मन अधिकाधिक रमने लगा।

परमाध्य गुरूदेव इनके द्वारा किये गये ग्रन्थपाठ की प्रशंसा किया करते थे, क्योकि इनकी आवाज बहुत ही मीठी, सुरीली और प्रभावोत्पादक होती थी । इनके पाठ से सत्संगीगण भी प्रभावित होते थे । कनखुदिया मास ध्यान में ये भी ग्रन्थपाठ किया करते थे। मास - ध्यानोपरान्त गुरूदेव उस क्षेत्र में कई दिनों तक घूम- घूमकर सत्संग का प्रचार करते रहे । इस भ्रमण के दौरान गुरूदेव के आदेष से ये सदग्रन्थ - पाठ करते रहे । इनके सदाचरण और पाठ की सुरूचिपूर्ण कला के कारण गुरूदेव इनपर विषेश कृपादिृष्टि रखते थे साथ ही इनके भोजन तथा अन्य सुविधाओं का भी खयाल रखते थे। उस क्षेत्र का प्रचारकार्य समाप्त होने पर गुरूदेव ने इनसे कहा,’’अब आप अपने काम पर जाइये। ’’इन्हें सहसा विश्वास नही हुआ कि गुरूदेव इन्हें वापस भेज सकते है। अपनी विश्वास पर पानी फिरते देख विकल होकर इन्होंने गुरूदेव से प्रार्थना की, मैं आपके साथ रहने के सिवा और कुछ नहीं चाहता । कृपा कर मुझे निराश न करें । ’गुरूदेव बोले-अभी आप जो काम करते हैं,कीजिये। आवश्यकता होगी तो बुला लूँगा। आपने गुरूदेव के आदेष को षिरोधार्य किया और पुनः सैदाबाद लौट आये और अध्यापन के साथ- साथ साधना करते रहे।

सन् 1140 ई0 में गुरूदेव विभिन्न सन्तों की वाणियों का संकलन करके सत्संग -योग नामक एक पुस्तक का प्रकाशन करवाना चाहते थे। इस ग्रन्थ की पाण्डुलिपि तैयार करने के लिए पूज्य लच्छन बाबा द्वारा खबर भेजकर गुरूदेव ने आपको फिर बुलाया। पुनः गुरूदेव की आज्ञा का पालन करते हुए आपने चिह्रित आध्यात्मिक रचनाओं की पाण्डुलिपि तैयार करनी षुरू की। पर्याप्त श्रम से महीने भर में पाण्डुलिपि के तैयार होने के बाद गुरूदेव ने आपको अपनी माँ की सेवा में गम्हरिया भेज दिया। अपनी माताजी की सेवा के साथ-साथ आप गुरूदेव के दर्शनों के लिए भी बराबर आया करते थे। सन् 1146 ई0 में आपकी माताजी परलोक सिधार गई।

सन् 1146 ई0 में प्रकाशित’ सत्संग-योग’ में छापे की बहुत- सी अशुद्धियाँ रह गई थीं] जिन्हें गुरूदेव के आदेशानुसार आपके मनिहारी आश्राम में रहकर शुद्ध किया। सन् 1141 ई0 में गुरूदेव के आदेश पर आप अध्यापन-कार्य छोड़कर निरन्तर उन्हीं की सेवा में रहने लगे। आपने अपनी सुख- सुविधा का ध्यान न रखकर गुरूदेव की सेवा-सहायता में दिन बिताना शुरू कर दिया। गुरूदेव आपकी सेवा से प्रसन्न होकर आपको, सन्तसेवीजी कहने लगे। कालान्तर में आपकी प्रसिद्धि भी इसी नाम से हुई। 2 जून 1152 ई0 को गुरूदेव ने आपको सुरत शब्द योग की क्रिया बता दी और आप पूरी तत्परता से साधना करने लगे। एक बार गुजरात से साधु-सम्मेलन में भाग लेने के लिए गुरूदेव के पास आमन्त्रण आया। अस्वस्थतावष गुरूदेव वहाँ जाने में असमर्थ थे, अतः श्रीधर बाबा के साथ आपको सम्मेलन में भाग लेने के लिए उन्होंने भेजा। उस समय तक आप श्वेत वस्त्र धारण करते थे। इसी अवसर पर 17 अक्टूबर, 1157 ई0 में गुरूदेव ने संन्यास संस्कार करके आपको और पूज्य श्री श्रीधर बाबा को गैरिक वस्त्र प्रदान किया। गुरूदेव द्वारा प्रदत गैरिक वस्त्र में ही आपने सम्मेलन में भाग लिया और वहाँ सारगर्भित प्रवचन देकर लोगों को मन्त्रमुग्ध कर दिया। आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुई है: जैसे-1. ओम्- विवेचन, 2. योग- माहात्म्य, 3. जग में ऐसे रहना, 4. लोक-परलोक-हितकारी, 5. सत्य क्या है, 6. सुख-दुःख, 7. गुरू-महिमा आदि।

गुरूदेव के जीवनकाल तक आपने उनकी अनन्य सेवा की। श्रीगुरूदेव को भोजन कराना, दवाएँ समय पर देना, आदेशनुसार पत्रों का उत्तर लिखकर भेजना, आगत पत्रों को पढ़कर सुनाना आदि कार्य आप श्रद्धा एवं मनोयोगपूर्वक करते थे। गुरू महाराज के कार्यक्रमों में आप उनके साथ जाते और उनके आदेश पर सत्संग में प्रवचन किया करते थे। आप परमाराध्य गुरूदेव के प्रवचनों को लिपिबद्ध कर लिया करते थे, जिनका शान्ति-संदेश में नियमित प्रकाशन होता है। गुरूदेव ने सन् 1170 ई0 में आपको दीक्षा देने का अधिकार दिया। गुरू महाराज कहा करते थे कि सन्तसेवीजी मेरे मस्तिष्क हैं। स्वामी श्रीसन्सेवीजी सन्तमत के मुख्य प्रचारक के रूप् में प्रसिद्ध हैं। सन्तमत-सत्संग को इनसे बहुतेरी आषाएँ हैं। अतः गुरूदेव से प्रार्थना है कि आप दीर्घायु होकर आध्यात्मिक पथ के पथिकों को राह दिखाते रहें।