परम संत बाबा देवी साहब

अलीगढ़ जिले में हाथरस अनुमंडल (तहसील) में मुंशी महेश्वरी लाल जी नामक सज्जन कानूनगोई का काम करते थे। ये कायस्थ कुल के थे और संत तुलसी साहब हाथरसी के प्रेमी भक्त, शिष्य थे। संत तुलसी साहब कभी-कभी अहैतुकी कृपा करके इनके घर पर पधारते थे; क्योंकि साहबजी मस्तमौला संत थे। किसी की चिकनी-चुपड़ी बातों से नहीं रीझते थे, बल्कि शुद्ध और सच्चे दिल के भावों, व्यवहारों से रीझते थे।

बाबू महेश्वरी लालजी की कई संतानें हो-होकर मर जाया करती थीं, जिससे वे बहुत दुःखी रहा करते थे! लेकिन उन्होने यह मालूम था कि हमारे गुरुदेव अंतर्यामी मस्तमौले फकीर हैं। यदि वे उचित समझेंगे, तो हमारी मनोकामना पूरी करेंगे। बस ऐसा ही हुआ। एक दिन संत तुलसी साहब खुद ही कृपा करके उनके घर पधारे। स्वाभाविक शिष्टाचार और स्वागत करने के बाद वे अपने आप मौज में आकर बोलने लगे-"तुम संतान के अभाव का दुःख झेल रहे हो। चिन्ता न करो, इस बार तुम्हारे घर में एक पवित्रा और महान् आत्मा का जन्म होगा। तुम उसका लालन-पालन बड़ी सावधनी के साथ करना, वह तुम्हारे नाम को रौशन करेगा। लेकिन तुम ध्यान-भजन भी करते रहना, छोड़ना नहीं।"

वर्ष पूरा होते-होते वह समय भी आ गया, जबकि संत तुलसी साहब की भविष्यवाणी सच हुई। 6 मार्च सन् 1841 ई0 का वह शुभ दिन आया, जबकि बाबा देवी साहब ने ग्राम पकड़िया थाना.रंगवाराए तहसील.हाथरस और जिला.अलीगढ़ की पावन धाम को सौभाग्यशालिनी बनाया। पुरोहित के द्वारा बालक की जन्म. कुण्डली बनवायी गयी। जन्म.कुण्डली के अनुसार पंडितजी बोले कि यह शिशु बड़ा ही प्रतापी, तेजस्वी और धर्मात्मा होगा। हिन्दू ही नहीं, दूसरे धर्म-सम्प्रदाय के लोग भी इनका आदर करेंगे, यश गायेंगे। 
    महेश्वरी बाबू के किसी संबंधी भाई ने बालक का नाम देवी प्रसाद रखा, जो बाद में बाबा देवी साहब के नाम से प्रसिद्ध हुए। बाबा देवी साहब के जन्म का समय 6 बजे सुबह और दिन रविवार है। माताजी का नाम मंजू देवी और दादा श्रीकुलदीप लाल दास तथा दादी जी का नाम श्रीमती चंद्रकला देवी है।
    बाबू महेश्वरी लाल जी को आशीर्वाद देकर संत तुलसी साहब कहीं बाहर की यात्रा पर चले गये थे। चार साल के बाद पुनः आये। जैसे ही मुंशी जी को पता चला कि गुरुदेव तुलसी साहब अपनी कुटिया में लौट आये हैं, उन्हें बड़ी खुशी हुई और तत्काल अपनी पत्नी और पुत्र को लेकर उनके दर्शन के लिए चल पडेगा क्योंकि संतों की मौज का क्या ठिकाना, कब कहाँ निकल जायें? कुटिया पर पहुँचकर पति-पत्नी दोनों ने पहले गुरुदेव के चरणों में माथा टेका और फिर पुत्रा को भी प्रणाम करवाया। संत तुलसी साहब बच्चे को देखकर बड़े खुश हुए और अपना दायाँ हाथ उनके सिर पर कुछ देर तक रखे रहे। फिर बोले कि यह बच्चा बड़ा ही संस्कारी है। यह अपने आध्यात्मिक ज्ञान से भारत के मानव को एक नई दिशा प्रदान करेगा, जागृति पैदा करेगा।

बालक सचमुच में संस्कारी निकला। यह बड़ा ही तेजस्वी, सरल, सच्चा और निर्भीक बालक था। छः वर्ष की अवस्था में ही वह घंटों ध्यानस्थ रहने लगे। बचपन में भी इन्हें खेल-कूद की अपेक्षा सत्संग-वचन सुनना अच्छा लगता था। एक अच्छे अध्यापक के पास इनकी पढ़ाई शुरू हुई, किन्तु अध्यापक भी इनकी गंभीर मुद्रा और चिंतन शक्ति को देखकर तथा विचित्र प्रश्नों को सुनकर जाते थे।
    एक बार गाँव के देवी स्थान में पूजा की भीड़ जमा हुई थी। यह देवी प्रसाद भी बाल स्वभाव उत्सुकतावश वहाँ पहुँच गया। देखा कि एक चबूतरे पर पंडितजी संस्कृत श्लोकों को पढ़ रहे थे और सामने एक आदमी के हाथ में रस्सी से बॅंधा एक बकरी का बच्चा खड़ा था। इसने पूछा कि यह क्या हो रहा है? लोगों ने बताया कि एक कोई आदमी का बालक बीमार है, उसी को ठीक करने के लिए देवी माई को यह बलि चढ़ाई जाएगी। यह सुनकर बालक देवी प्रसाद बेहोश होकर गिर पड़ा। भीड़ में हड़कम्प मच गयी और इसके मुँह पर जल के छींटे देकर होश कराया गया। किसी ने कहा कि अरे! छोटे बच्चों का दिल ही कोमल होता है, इन्हें यहाँ लाना ही नहीं चाहिए था। इसे देवी प्रसाद ने सुन लिया और बोले, तो क्या बड़ों का दिल पत्थर का हो जाता है? एक तो किस पाप के कारण लोगों में बीमारी होती है तथा उसपर जीव हत्या का एक और पाप! बालक देवी प्रसाद की बात सुनकर उस बकरे को संकल्प कराके छोड़ दिया गया। उसे काटा नहीं गया।
    कुछ काल बाद ही हाथरस में आर्य समाज के प्रवर्तक विद्वान् आचार्य स्वामी दयानन्द सरस्वतीजी भ्रमण करते हुए आये। उनकी विद्वता और अकाट्य तर्कों का बड़े-बड़े विद्वान् लोहा मानते थे। शहर में उनका शोर मच गया। लोग चारो ओर से उनका प्रवचन सुनने और अपनी समस्या समाधन कराने हेतु आने लगे। देवी प्रसाद के चाचाजी भी बच्चे की जन्म-कुण्डली लेकर स्वामीजी के पास पहुँचे। भेंट के उपरान्त स्वामी दयानन्द ने बालक देवी प्रसाद से कुछ प्रश्न पूछे। बालक ने उन प्रश्नों के ऐसे सटीक और अकाट्य उत्तर दिये कि स्वामीजी स्वयं आश्चर्य करने लगे। तब वे जन्म-कुण्डली लौटाते हुए बोले कि जाओ बालक, तुम्हारे सब ग्रह अच्छे हैं।

14 वर्ष की अवस्था में बालक देवी प्रसाद की माताजी स्वर्ग सिधार गयी। इससे बालक के दिल पर बहुत बुरा-दुखद असर हो गया। पढ़ना-लिखना बंद कर दिया और उनका चित्त संसार से भी उचाट हो गया। अभी माता की मृत्यु का सदमा कुछ कम भी नहीं हुआ था कि पिताजी की भी छाया सिर से उठ गयी। बालक देवी प्रसाद अब घर में भी रहना नहीं चाहने लगे। वे विरक्त फकीरी जीवन की बात करने लगे। कुटुम्ब-परिवार के अन्य लोग इन्हें गृहस्थी में जीने के लिए शादी की सलाह देने लगे। किशोर देवी प्रसाद बोले कि मैं ब्रह्माजी का ठेकेदार नहीं हूँ। मुझे मुक्ति प्राप्त करनी है और अन्यों को भी करानी है। मैं ईश्वर-भक्ति करूँगा।
    जब इन्होंने किसी की बात को नहीं माना, तो इनके संबंधी भाई पद्म दासजी आये, वे इनसे विशेष स्नेह रखते थे। पद्म दासजी राध स्वामी मत के सत्संगी थे और आगरे में ही डाक विभाग की नौकरी करते थे। पदम दासजी के आग्रह पर किशोर देवी प्रसाद उनके साथ आगरा चले गये। पद्म दास ने इनको राधस्वामी मत के दूसरे आचार्य रायबहादुर शालिग्राम साहब से मिलाया। शालिग्राम साहब डाक विभाग के सबसे बड़े अधिकारी (Post Master General) थे। पदम  दासजी ने आचार्यजी से देवी प्रसाद की मनसा बतायी। वे बोले कि देखो, तुम्हारी हार्दिक भावना तो ठीक है, परन्तु अब भीख माँगकर खाने और भजन करने का समय नहीं रहा। लोग श्रद्धा-प्रेम से साधु को भीख नहीं देते, उन्हें भार लगता है। तुम स्वावलंबी जीवन जीकर ही इस गुरुतर धर्म-कर्म को सँभाल सकोगे, अन्यथा नहीं। अतः मैं तुम्हें डाक विभाग में ही काम लगा देता हूँ। तुम काम करके पैसा प्राप्त करो और शेष समय में अपनी इच्छानुसार ध्यान-सत्संग भी करो। नवयुवक देवी प्रसाद को बात जँच गयी और इन्होंने नौकरी कर ली।

उस समय इनका वेतन 30 रुपये महीना था। ये नौकरी के काम के अनुसार कई शहरों और कस्बों में रहे। वेतन के पैसे से अपना काम चलाने के साथ ही गरीबों और दुखियों की मदद भी करते रहे तथा कुछ पैसे जमा भी करते गये।
    सन् 1881 ई0 में इनकी बदली मुरादाबाद हो गयी। वहाँ एक प्रेमी सज्जन श्री वंशीधर साहु से इनका सम्पर्क हुआ। ये उनके यहाँ ही रहने लगे और उन्हें अपने वर्षों के जमा रुपये अमानत रखने दे दिये। उस सज्जन ने इनके रुपये को अपने व्यापार में लगा दिया और इनको 30 रुपये मासिक तौर पर देने के लिए निश्चित कर दिया। इतना रकम तो इनके मासिक खर्च के लिए पर्याप्त था। इन्होंने नौकरी से त्याग-पत्र दे दिया और अपना सारा समय भजन-साधन में लगाने लगे। इनका भोजन और रहन-सहन तो बिल्कुल ही साधरण था। पोशाक के नाम पर हर ॠतु में एक लम्बा बाँह का काला चोंगा, जो गले से लेकर पैर के घुटने तक होता था, काफी था। एक दो कोपीन और एक दो गमछी, चादर और कम्बल, बस इनका यही वस्त्राभूषण था। स्वामी गीतानन्द भिक्षु की उक्ति है
    खाओ सादा पहनो सादा, मुसीबत न सिर पर आयेगी । 
        चार दिन की जिन्दगी, आराम से कट जायेगी ।।

बाबा साहब के सरल एवं सात्विक जीवन से लोग बहुत प्रभावित हुए और हर वर्ग के लोग इनसे जुड़ने लगे। 
    ये संसार में बाबा देवी साहब के नाम से जाना जाने लगे। कुछ लोग इन्हें आदर से बाबा साहब भी कहते थे। ये सत्संग के द्वारा ईश्वर-भक्ति अथवा आत्म-कल्याण की बात समझाते थे। सच्चे जिज्ञासुओं को अंतस्साधना का भेद भी बतला दिया करते थे। ये अपने सत्संग को संतमत का सत्संग कहते थे। बाबा देवी साहब के प्रवचन में-ईश्वर-स्वरूप, आत्मज्ञान-प्राप्ति, ज्योति, नाद, सदाचार, कर्मफल, स्वर्ग-नरक, निजात (मोक्ष), पिण्ड-ब्रह्माण्ड का भेद और आवागमन का रहस्य आदि बतलाते थे।
    सन् 1883 ई0 में इनके प्रेमी सज्जन वंशीधर साहु का शरीर पूरा हो गया। तब बाबा देवी साहबजी को एक अन्य सज्जन भक्त बुलाकी दासजी ने अपने मकान में लाकर रखा। यहाँ ही रहकर बाबा साहब सत्संग प्रचार करने लगे। इसी क्रम में बाबा साहब ने तुलसीदासकृत रामचरितमानस की अनोखी टीका लिखी-‘बाल का आदि और उत्तर का अंत।’ इस टीकाग्रंथ में बाबा साहब ने ईश्वर के नाम की महिमा, कर्मरहस्य, भक्ति का स्वरूप, ज्ञान की विशेषता आदि सार विषयों पर बड़ी उत्तम रीति से प्रकाश डाला है।
    बाबा साहब अपने सत्संग में संत तुलसी साहब-रचित ‘घटरामायण’ का पाठ करवाते थे और बाद में अपनी रचना ‘बाल का आदि और उत्तर का अंत’ भी। बाबा साहब ने इस्लाम धर्म को समझाने के लिए ‘शरफे इस्लाम’ की रचना की। 

बाबा साहब अपने सत्संग में संत तुलसी साहब-रचित ‘घटरामायण’ का पाठ करवाते थे और बाद में अपनी रचना ‘बाल का आदि और उत्तर का अंत’ भी। बाबा साहब ने इस्लाम धर्म को समझाने के लिए ‘शरपफे इस्लाम’ की रचना की।  26 पफरवरी, 1886 ई0 को बाबा साहब अपने दो योग्य पात्रा मुंशी रघुवर दयाल और बलदेव कहार को साथ लेकर सत्संग प्रचार यात्रा पर निकल पड़े। जहाँ जाते पहले विज्ञापन-पत्र (पर्चे) छपवाकर बँटवाते और नियत समय पर आगुन्तकों के बीच प्रवचन करते। सदाचार का पालन करते हुए मेहनत की कमाई पर अंतर्साधन कर ईश्वर-लाभ (मुक्ति) हेतु अंतज्र्योति और अंतर्नाद की साधना करने का उपदेश देते। इस पुनीत कार्य हेतु सच्चे संत सद्गुरु की नितांत आवश्यकता बतलाते।

अपने संतमत-सत्संग के प्रचार के क्रम में ये भारत के विभिन्न मुल्कों, शहरों और कस्बों में गये। इस यात्रा के क्रम में बाबा साहब लखनउ, बनारस, डुमराँव, बक्सर, बाँकीपुर ;पटना, जमालपुर, मुंगेर, पूर्णियाँ, काढ़ागोला, संथाल-परगना के चरका-कोरका-चकवा- रमला के अलावे बोधगया, मोकामा, दरभंगा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, छपरा, देवरिया, गोरखपुर और बस्ती जिला आदि स्थानों में गये।
    सत्संग-प्रचार से लौटने पर जब बाबा साहब अपने स्थायी निवास मुरादावाद पहुँचते, तो पता लगने पर लोगों की भीड़ लगी ही रहती। देश के विभिन्न भागों से लोग आते ही रहते थे। सत्संग-प्रचार के क्रम में बहुत बार बाबा साहब लोगों के दुःख-कष्ट को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से दूर किया करते थे। सत्संग-प्रचार का यह क्रम भी इनका अनवरत रूप से 1916 ई0 तक चलता रहा।
    इसी प्रचार के क्रम में बाबा साहब ने पटियाला, जलंधर, गुरुदासपुर, गुजरांवाला, लाहौर, जम्मू-कश्मीर, झेलम, रावलपिंडी और शाहपुर आदि अनेक महत्त्वपूर्ण जगहों पर जाकर अपने अमृतज्ञान का प्रचार किया। जम्मू-कश्मीर के महाराजा सर प्रताप सिंहजी और महाराजा हरि सिंह जी को भी बाबा साहब के सत्संग का लाभ उठाने का सौभाग्य मिला था। इसके बाद की यात्रा का पता नहीं है।
    1916 ई0 के बाद बाबा साहब का बाहरी सत्संग-प्रचार बंद हो गया। लोग मुरादाबाद आकर ही उनके सत्संग का लाभ लेते रहते। इनके कतिपय सत्संग-पे्रमी दीक्षित अन्य शिष्य ये हैं-सदराला साहब और चुन्नालाल टंडन (मुरादाबाद), महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज, श्रीराजेन्द्र नाथ सिंहजी, महेन्द्रनाथ सिंहजी, भागलपुर, श्रीराम दासजी (परमहंस ध्यानानन्द) और श्रीधीरजलाल गुप्तजी (गुरुजी), पूर्णियाँवाले, श्रीदीन दयाल रामदास, श्रीगोपी गुरुजी, श्रीननकू मंडलजी (गोड्डा-संथाल परगना) आदि।
    1918 ई0 से बाबा साहब प्रायः अंतर्मुख रहने लगे और मुक्ति आनंद में मस्त। 15 जनवरी 1919 ई0 से बाबा साहब की अवस्था बिल्कुल अलग ही रहने लगी। बाबा साहब प्रायः लोगों से बातचीत भी नहीं करते और न तो भोजन और जलपान ही करते, बस कभी-कभी मात्रा जल पी लिया करते। उनकी नाड़ी गति कभी बंद हो जाती और कभी स्वतः चलने लगती।
    18 जनवरी 1919 ई0 की शाम को बाबा साहब ने मुरादाबाद के सभी सत्संगियों को अपने पास बुलाया और अपने अंतिम उपदेश दिये-संसार और उसके सम्पूर्ण दृश्य पदार्थ नाशवान है। चिता में जलने और कब्र में दाखिल होने के पहले मोक्ष प्राप्त करो। झूठ, चोरी, ध्न- संग्रह संबंधी लूट-खसोट आत्मकल्याण में बाधक है।;
    19 जनवरी, 1919 ई0 के प्रातःकाल रविवार के दिन में लगभग साढ़े आठ बजे संतमत के महान् उन्नायक सद्गुरु बाबा देवी साहब इस असार-संसार से सदा के लिए विदा होकर चिर निद्रा में लीन हो गये।
    आज बाबा साहब स्थूल शरीर में हमारे बीच नहीं हैं, परन्तु उनके द्वारा प्रकाशित ज्ञान ज्योति उनके भक्तों के रूप में आज भी मौजूद है। उनके ही समर्थ उतराधिकारी योग्यतम शिष्य प्रवर संतमत के प्रबल प्रचारक महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज ने उनकी ज्ञान-ध्वजा को देश-विदेश और दिगन्त में फहराया। परम संत  बाबा देवी साहब का एक पद स्मरणीय है-
हमारा मालिक सबके माहीं ।।
सबमें है और सब तें न्यारा, ऐसा अदभुत साईं ।
जो गुरु मिले तो भेद बतावे, बिन गुरु दरस न पाई ।।
सब तें बड़ा छोट सबही तें, घट घट रहा समाई ।
जा घट में परगट होय दरसे, वाके बलि बलि जाहीं ।।
रूप रंग आकार न वाके, वेद नेति करि गाई ।
देवी कस कस वाहि बखाने, कहन सुनन में नाहीं ।।
    इसके अलावे उनका और भजन प्रकाशित नहीं मिलता। यही उस महापुरुष का प्रथम और अंतिम भजन है।
स्वावलंबी जीवन
    घटरामायण की भूमिका से-जीव के उद्धार का मार्ग हर एक मनुष्य के अन्तर में मौजूद है। जबतक कि कोई जीव इस पर न चलेगा, धर्म और पंथ का असली फल मोक्ष नहीं प्राप्त हो सकता है और न अपने और दूसरे के धर्म की असली जड़ और सच्चाई को जान सकता है और न उन ग्रन्थों और पोथियों के मतलब को कि जो उसके धर्म  और पन्थ के हैं, समझ सकता है, चाहे कैसा ही पंडित-मौलवी-पादरी हो कि जो ईश्वर या खुदा की बोली को समझ सकता हो । लेकिन पंथ और धर्म  उसके नजदीक या तो एक खेल या तमाशा है या दुनिया में दंगा और फिसाद फैलाने का और भोले-भाले जीवों को धोखा देने का उमदा सिद्धान्त है; क्योंकि हर मत की सच्चाई की जाँच जाँचने से मालूम हो सकती है, और जाँचने का थर्मामीटर ईश्वर या खुदा ने हर जीव अमीर, गरीब, पंडित, मौलवी, पादरी, ज्ञानी, अज्ञानी, पापी, पुण्यात्मा और ब्राह्मण, सैयद से लेकर भंगी, चमार, कसाई तक कुल के अन्तर में एक-सा रखा है; जबतक कि कोई मनुष्य इस पैमाने से कि जो खास उसके अन्तर में है, अपने आचार्य और अपने मत की सच्चाई और महिमा को नहीं जाँच सकता है, तो दूसरे के मत की सच्चाई और महिमा को क्योंकर जान सकता है।
साधु और सन्त वह कहलाते हैं कि जो दुनियाँ में सीधी और सलामत रवी की चाल को अख्त्यार करते हैं और सुरत अर्थात् ख्याल से ध्यान करने का उपदेश करते हैं, जिसे चाहे बैठ के करो, चाहे लेट के करो, और न कोई मत-मतान्तर की बूझ होती है-वैदीकधमर्मी, मुसलमान, ईसाई कुछ बने रहो, परन्तु दुनियाँ में दुःख-सुख भोगते हुए अन्तर में बिना अभ्यास किए एक दिन भी मत रहो।
इनका (साधु-संतो का) सबसे छोटा सिद्धान्त  है, न तो अब तक वह संस्कृत, अरबी, पफारसी, इबरानी में पाया जाता है और न उसने अभी तक किसी प्रेस या छापेखाने का मुँह देखा है। बल्कि उसकी नकल मनुष्यों के अन्दर पाई जाती है और वह चोदह सफों में लिखी हुई है । जबतक कि कोई अन्तर में अभ्यास न करे, तबतक न तो उसके अक्षर जान सकता है और न उसे पढ़ सकता है ।

।। घटरामायण की भूमिका से ।।
(1) दृष्टि-साध्न उसको कहते हैं कि जो आँख के साथ अभ्यास किया जाता है । इसके साध्न करने के सैकड़ों गुर और अमल हैं कि जो भारतवर्ष और दूसरे मुल्कों में जारी हैं, लेकिन बाजे इनमें से ऐसे होते हैं कि जिनसे आँख के दोनों गोले टेढ़े पड़ जाते हैं । और बाजे ऐसे हैं कि जिनसे आँख जाती रहती है और बाजे कायदे ऐसे भी हैं कि जिनसे आँख की दोनों पुतलियों को, जिनमें से होकर रोशनी बाहर को निकलती है, खराब कर देते हैं, जिनसे पिफर आँखों से धुॅंधला दिखाई पड़ता है और चाहे तमाम उमर हकीम, वैद्य, डाॅक्टर इलाज करें, किसी तरह पुतलियाँ दुरुस्त नहीं होतीं । दृष्टि से अभ्यास करने का वह कायदा है, जिसको आँख और आँख के गोले से कुछ तआल्लुक नहीं है और न दृष्टि के मानी आँख और आँख के गोले के हैं, जिनसे कि वह नुकसान होते हैं, जो ऊपर बयान किये गये हैं ।
दृष्टि, निगाह को कहते हैं कि जो मांस और खून की बनी हुई नहीं है । मुनष्य में यह निगाह ऐसी बड़ी ताकतवर चीज है कि जिसने बड़े-बड़े छिपे हुए साइन्स और विद्याओं को निकालकर दुनियाँ में जाहिर किया है और सिद्धि वगैरह की असलियत और मसालों का पता जिससे कि वह हो सकती है, सिवाय इसके और किसी से नहीं लग सकता है । योग-विद्या के सीखने का दृष्टि पहिला कायदा है और इसके अभ्यास करने का गुर ऐसा उमदा है, जिससे स्थूल शरीर के किसी हिस्से को कुछ तकलीफ नहीं होती है और अभ्यासी इसके अभ्यास से उन निशानों को, जिनको कि ईश्वर या खुदा की आकाशी और आसमानी ग्रंथों और किताबों में सबसे बड़ा बतलाया है, जल्द पाकर मालूम कर लेता है और फिर तमाम दुनियाँ के सिद्धान्त और असूल अभ्यासी के रू-ब-रू हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं कि जो तमाम उमर पोथियों और ग्रंथों के पढ़ने और सुनने से हासिल नहीं होतेे । लेकिन दृष्टि सिर्फ उस जगह पहुँच सकती है, जहाँ तक कि रूप है और जहाँ से कि आवागमन हो सकता है, आगे उसके नहीं जा सकती, जहाँ कि रूप और रेखा कुछ नहीं है और जहाँ से कि मोक्ष होता है। सन्तों के मत में सबसे बड़ा पदार्थ मोक्ष है और उस जगह तक दृष्टि नहीं जा सकती। इसलिए शब्द का दूसरा कायदा वहाँ पहुँचने को उपदेश किया गया है ।
अबतक यह नहीं मालूम हुआ कि सबसे पहला वह कौन मनुष्य था, जिसने कि दुनियाँ में गुरु और गुर के असूल को कायम किया । अगर वह मनुष्य इस असूल को कायम न करता तो, न तो असली मालिक का पता लगता और न कोई इन्तजाम मुनासिब तरह से होता । धर्म  और मतों में न पीर-पैगम्बर, औलिया-औतार-देवता, ॠषि और मुनि होते और न दुनियाँ की बादशाहत और राज का आज के दिन नाम सुना जाता और जितनी सभा और सोसाइटी के जो अब तक जारी हैं, पते को न होतीं और पुत्र को न कुछ पिता का ख्याल होता और न स्त्राी अपने पति की हुक्मबरदार होती ।
दुनियाँ की जितनी कारीगरी और सनद बीo एo, एमo एo, शास्त्राी, हाफिज, मौलवी, सिविलियन-डाॅक्टर, बढ़ई, चमार, कोली से लगाकर ईश्वर और उसका रास्ता, कुल गुरु के मोहताज हैं। जिन लोगों की दीनी और धर्म के जलसों में गुरु को नहीं माना जाता है, वे लोग हमेशह दंगा-फिसाद मचाते रहेंगे और जिन्दगीभर चक्कर में रहेंगे; क्योंकि न इसका कोई समझानेवाला है और न यह समझनेवाले है कि इन्होंने उस पवित्रा और आकाशी सिद्धान्त को नहीं माना, जिसको कि सबसे पहले मनुष्य ने कायम किया था।
अधिकारी-जो लोग कि दुनियाँ के कामों में हर वक्त लगे रहते हैं और एक-दो घण्टे की भी फुर्सत नहीं निकाल सकते, वे अन्तर- भजन के अधिकारी नहीं हैं; क्योंकि अगर उनको अन्तरी भेद मालूम भी हो गया तो उनके किस काम का है।
सद्गुरु बाबा देवी साहब के परिनिर्वाणकालिक अन्तिम वचन, जबकि सत्संगियों ने उनसे साग्रह निवेदन किया था-आप तो चले जा रहे हैं, हमलागों को कुछ उपदेश देने की कृपा की जाय। इसपर उन्होंने यह कहने की कृपा की थी-दुनिया वहम है, अभ्यास करो।
बाबा देवी साहब के उपदेश-
1. चिता में जलने और कब्र में दाखिल होने से पहले मोक्ष प्राप्त करो।
2. वैदिक धर्मी, मुसलमान, ईसाई कुछ बने रहेऋ परन्तु दुनियाँ में सुख- दुःख भोगते हुए अंतर में बिना अभ्यास किये एक दिन भी मत रहो।
3. ऐ मनुष्य! यदि अनंत और सर्वव्यापक प्रभु को जानना चाहता है, तो आन्तरिक दृष्टि को सूक्ष्म बनाने के विन्दु-रूप का ध्यान कर।
4. सच्चा तीर्थ वह है कि जहाँ कोई संत-महापुरुष रहता है, भले ही वहाँ कोई मंदिर या नदी इत्यादि न हो।
5. सच्चा हवन वह है कि मनुष्य स्वयं अपनी कुवासनाओं, अज्ञान को ज्ञानाग्नि में आहुति दे। इससे मनुष्य स्वयं देवता बन जाता है।
6. संतमत का सच्चा उपदेशक वह है, जिसके हृदय, वाणी और कर्म में भेद नहीं है अर्थात् मनसा, वाचा, कर्मणा एक है। जैसा मन में होता है, वैसा ही वाणी से कहता है और तदनुकूल आचरण करता है।
7. सच्चा शिष्य वह है, जो गुरु को परमात्मा के तुल्य जानकर आदर करे, उनकी आज्ञाओं के अनुकूल चले।
8. प्रत्येक सत्संगी को चाहे, व स्त्राी हो या पुरुष, इस बात को ध्यान में रखनी चाहिए कि जबसे वह सद्गुरु की शरण लेकर सत्संग में सम्मिलित होता है, उसका दूसरा जन्म आरंभ हो जाता है। अब उसको पहले बेढंगी चाल पर ही न चला जाना चाहिए; किन्तु अपना चरित्र दिनों दिन उज्ज्वल और निर्मल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए कि जिससे किसी को गुरु और सत्संग के लिए अनुचित शब्दों के प्रयोग करने का अवसर प्राप्त न हो।
9. समस्त संसार के मनुष्य परस्पर भाई-भाई है और सबके भीतर आत्मिकोन्नति के लिए सच्चा और सरल मार्ग विद्यमान है। जो उसपर चलने को अभ्यास करेगा। वह सर्वोंतम पद में पहुँच जावेगा।
10. मनुष्य को न्यायपूर्वक कुछ धनोपार्जन करने के पश्चात् अभ्यास के लिए विरक्त जीवन धरण करना चाहिए, क्योंकि माँगने या माँगकर खाने की अपेक्षा अपनी कमाई से साधन  करना अभ्यासी के लिए विशेष लाभदायक होता है और ऐसा करने से निश्चिन्तता भी अधिक रहती है।
11.ऐ मनुष्य! न जाने तुझको कितनी योनियाँ भुगतकर यह मानव शरीर प्राप्त हुआ है। क्या तू अब भी भूल में पड़ा रहेगा! याद रख कि यदि तूने अब भी संतों की शरण न ली और उनके बताये हुए आंतरिक मार्ग पर न चला, तो फिर तेरे लिये चैरासी का चक्र सामने तैयार है।
12.संतमत का उपदेश लेकर जिसने एक बार भी अपने अंदर प्रकाश का अनुभव किया है, वह फिर नीचे की योनियों में नहीं जाता है।
13.सत्संगी को चाहिए कि दूसरों के अवगुणों को देखने, सुनने और प्रकट करने के स्वभाव को छोड़ता जावे और सांसारिक तथा पारलौकिक कार्यों को सत्यता से करे। खोटे कर्म से बचता रहे।
14.प्रभु का भजन दिखावे के लिए नहीं होना चाहिए। यह गुप्त रूप से करना चाहिए, अन्यथा मान और प्रशंसा होने पर मनुष्य फिर गिर जाता है।
15.संसार में परमेश्वर की बनायी हुई पुस्तक केवल एक है और उनमें दो पृष्ठ हैं-एक अंतरिक्ष और दूसरा पृथ्वी। दोनों में से सब शब्द निकलते हैं और उन्हीं में समा जाते हैं, अतः इस पुस्तक को पढ़ने की दृष्टि अपने में उत्पन्न करो।