परम संत तुलसी साहब

परमसंत तुलसी साहब की संक्षिप्त जीवनी

साधु-संत अपने जीवन के शुरू से ही रूहानियत की तरक्की के लिए अपने आपमें डूबे रहते हैं, उन्हें दुनियावी क्रिया-कलापों में विशेष दिलचस्पी नहीं रहती है। ज्यों-ज्यों उनका साधन बढ़ता जाता है, त्यों-त्यों उन्हें दुनिया फीकी और नीरस लगते जाते है। तभी तो सभी संतों ने अंत में अनुभव ज्ञान के आधर पर ‘ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या’ का उद्घोष किया है। रामचरितमानस में शिवजी उमा से कहते हैं
उमा कहहु मैं अनुभव अपना । सत हरिभजन जगत सब सपना ।।
यही कारण है कि संतों के विषय में सही और पूरी जानकारी कम ही प्राप्त होती है। तुलसी साहब के जीवन का वृत्तान्त तो और भी दुर्लभ है। उनके प्रारंभिक जीवन का विवरण अस्पष्ट और धुंधला है। यद्यपि वे उन्नीसवीं सदी के मध्य तक रहे, फिर भी उनके मूल नाम, उनके पिता और परिवार के बारे में इतिहास मौन है। तुलसी साहब के प्रारंभिक जीवन के विषय में जो विभिन्न विवरण मिलते हैं, वे संक्षेप में यहाँ दिये जा रहे हैं।
बेलवेडियर प्रेस द्वारा प्रकाशित तुलसी साहब ‘रत्न सागर’ (प्रथम प्रकाशन 1909 ई) में दिये गये जीवन-चरित्र के अनुसार तुलसी साहब का जन्म एक उच्च ब्राह्मण परिवार में हुआ था। किशोर अवस्था से ही आपको संसार के प्रति अरुचि थी। छोटी उम्र में ही सब कुछ त्याग दिया और अंत में जिला अलीगढ़ के हाथरस में आकर रहने लगे। इस वृत्तान्त में तुलसी साहब के असली नाम, उनके माता-पिता के नाम तथा उनके जन्म-स्थान के विषय में कोई उल्लेख नहीं है।
इसी प्रेस ने सन् 1911 में तुलसी साहब का प्रसि( ग्रंथ ‘घट रामायण’ प्रकाशित किया। इसके प्रारंभ में तुलसी साहब के जीवन-चरित्रा के विषय में और प्रकाश डालने का प्रयास किया गया। इसके अनुसार तुलसी साहब का जन्म सन् 1763 में हुआ और 1843 में 80 वर्ष की आयु में आपने शरीर छोड़ा। वे पुणा के राजा के सबसे बड़े पुत्रा थे। वे जाति के ब्राह्मण थे तथा उनका नाम श्यामराव था। उनकी इच्छा के विरूद्ध छोटी उम्र में ही उनके पिता ने उनका विवाह कर दिया। उनकी पत्नी का नाम लक्ष्मीबाई था और इस विवाह से उन्हें एक पुत्रा की प्राप्ति हुई। उनके पिता की रुचि अध्यात्म और प्रभु-भक्ति की ओर थी। वे अपनी गद्दी त्यागकर श्यामराव को राज्य देना चाहते थे, ताकि बाकी जीवन भक्ति में बितायें। परन्तु श्यामराव खुद भी संसार की ओर से उदासीन थे और राज्य-वैभव की जिंदगी के प्रति उनमें कोई झुकाव  न था। अपने राज्याभिषेक के एक दिन पहले ही वे अपने महल से भाग निकले। कापफी तलाश के बाद भी जब श्यामराव का पता न चला, तो उनके छोटे भाई को राजा बनाया गया।
श्यामराव कई वर्षों तक जंगलों, पहाड़ों, गाँवों और शहरों में घूमते रहने के बाद हाथरस में आये। हाथरस को आपने अपना स्थायी निवास बनाया और अपना बाकी जीवन यहीं बिताया। यहीं आप तुलसी साहब के नाम से प्रसिद्ध हुए ।
आचार्य क्षितिजमोहन सेन, डाॅ0 राजकुमार वर्मा, डाॅo पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी तथा अन्य आधुनिक विद्वानों ने उफपर दिये दो वृत्तान्तों में से एक को अपनाया है।
महाराष्ट्र के एक प्रमुख इतिहासवेत्ता श्रीविट्ठल राo ठकार ने हाल ही में पेशवा-वंश के दस्तावेजों का अध्ययन करके तुलसी साहब के विषय में कुछ खोज की है, जो इस बात की पुष्टि करती है कि तुलसी साहब पेशवा परिवार से संबंधित थे। यद्यपि श्रीठकार की खोज अभी पूरी नहीं हुई है, फिर भी उनका कथन है कि इस बात के पक्ष में समुचित आधर हैं कि तुलसी साहब वास्तव में पेशवा बाजीराव के प्रथम दौहित्रा (बाजीराव प्रथम की कन्या के पुत्र) अमृत राव थे। उनका जन्म 1763-64 में हुआ था और जब वे तीन-चार वर्ष के थे, तब रघुनाथ राव ने उन्हें गोद ले लिया था। इस प्रकार अमृतराव बाजीराव द्वितीय के बड़े भाई थे। शुरू से ही अमृतराव स्वभाव से गंभीर, विवेकशील और निष्कपट थे। राजनैतिक षड्यंत्रों से उन्हें घृणा थी। पेशवा दरबार के राजनैतिक दाव-पेंच से उफबकर वे सन् 1804 में पुणा छोड़कर बनारस आ गये और अपना जीवन मालिक की भजन-बंदगी में लगा दिया। 1808-9 में आप हाथरस आये और वहाँ अपने अंतिम समय 1843 तक रहे। परन्तु यह स्पष्ट पता लगता है कि अमृतराव कब और कैसे तुलसी साहब के नाम से पुकारे जाने लगे।

उपर दिये वृत्तान्तों पर गौर करने से यह पता चलता है कि इन सभी में कुछ ऐसी बातें हैं, जिन्हें काफी हद तक सही माना जा सकता है। संक्षेप में ये इस प्रकार हैं-
तुलसी साहब ने उच्च तथा कुलीन परिवार में जन्म लिया था और वे पेशवा के राजवंश में से थे। ऐश्वर्यों को त्यागने की ओर शुरू से उनका झुकाव था।
वे अपने जन्म-स्थान से भागे और कोई पहचान न ले, इसलिए अपने को छिपाये रखे। हो सकता है कि अपने को अज्ञात रखने के लिए ही उन्होंने अपना नाम श्यामराव रख लिया हो।
उन्होंने बहुत भ्रमण और अनेक यात्राएँ कीं और अंत में जिला अलीगढ़ के हाथरस को अपना स्थायी निवास-स्थान बनाया।
यह भी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि तुलसी साहब दक्षिण भारत से आये थे, क्योंकि लोग उन्हें ‘दक्खिनी बाबा’ के नाम से पुकारते थे।
इस बात से पता नहीं लगता कि तुलसी साहब को कब सद्गुरु मिले और न यह ही पता लगता है कि सुरत-शब्द-योग के मार्ग में वे कब दीक्षित हुए। जब वे पुणा में राजकुमार थे, उस समय या बाद में जबकि सब कुछ त्यागकर उन्होंने एक भ्रमणशील जीवन अपनाया।
तुलसी साहब ने अपनी रचनाओं में सतगुरु के प्रति अपनी श्रद्धा तो प्रकट की है, पर उनके नाम का उल्लेख नहीं किया है। एक मराठीभाषा के विद्वान् ने एक पत्रिका में लिखा है-तुलसी साहब को उनके गुरु ने हाथरस शहर में दीक्षा दी और अपने गुरु के आदेशानुसार उन्होंने बहुत अभ्यास किया।
सभी युगों में, सब संतों ने परमात्मा की प्राप्ति के लिए वक्त के सद्गुरु की आवश्यकता पर जोर दिया है। संतमत में सद्गुरु की बहुत जरूरत है। सद्गुरु के बिना आन्तरिक रूहानी यात्रा संभव नहीं है।

तुलसी साहब ने अपनी रचनाओं में स्थान-स्थान पर गुरु की आवश्यकता पर जोर दिया है। आप बड़े स्पष्ट शब्दों में ‘रत्न सागर’ में लिखते हैं
बिन सतगुरु उपदेश, सुर नर मुनि नहिं निस्तरे।
ब्रह्मा विष्णु महेश, और सभन की को गिनै ।।
सतगुरु बिना भव माहिं भटके, अटक नहिं गुरु की गही ।
भृंगी  भवन  नहिं  कीट  पावे, उलटि  भृंगी  ना  भई ।।
                                                  -रत्न सागर, पृष्ठ 7
स्वयं तुलसी साहब ने भी गुरु धरण किया था, इसके संकेत उनके कई शब्दों से मिलते हैं। अपने सद्गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए आप फरमाते हैं-
सतगुरु अगम अपार, सार समझि तुलसी कियो ।  
दया   दीन  निरधर,  मोहि  बाहिर  लियो ।।
सतगुरु संत दयाल, करि निहाल मो को दियो ।  
सुरति सिंध् सुधर, सार पार जद लखि परड्ढो ।।
                                          -घटरामायण, भाग 1, पृष्ठ 8
इसी प्रकार तुलसी साहब सतगुरु की कृपा से अपने अंदर हुए

परिवर्तन का वर्णन एक सुंदर दृष्टान्त के द्वारा करते हैं-
मैं लोहा जड़ कीट समाना । गुरु पारस संग कनक कहाना ।।
तुलसी सतगुरु पारस कीन्हा । लोहा सुगम अगम लखि लीन्हा ।।
                                                   घटरामायण, भाग 2, पृष्ठ 191
धीरे-धीरे तुलसी साहब के पास जिज्ञासुओं और शिष्यों की बड़ी संख्या में समुदाय आने लगे। ब्राह्मण से शूद्र तक सभी जाति के लोग, गरीब से लेकर अमीर तक सभी स्तर के लोेग, विद्वान् और अनपढ़ किसान उनके सत्संग में आने लगे। तुलसी साहब सत्संग के लिए हाथरस से बाहर भी जाया करते थे। उत्तरप्रदेश के ग्रामों और शहरों में वे प्रायः जाया करते थे। उनके शिष्यों में आगरा के सेठ दिलवाली सिंह, उनकी पत्नी महामाया, उनकी माता, सास और बहन भी थीं। ये सभी तुलसी साहब के प्रेमी शिष्य थे तथा तुलसी साहब कई बार आगरा आते-जाते रहते थे। आगरा में आप पन्नी गली में सेठ दिलवाली सिंह के घर में ठहरते थे तथा वहीं सत्संग करते थे। सन् 1987 ई0 में अक्टूबर का महीना था। वर्षा के बाद सेठ दिलवाली सिंह के यहाँ रेशमी, जरी के कपड़े कमख्वाब व कीमती उफनी कपड़े, शाल आदि छत पर धूप में सुखाये जा रहे थे। एक दिन पहले ही वर्षा हुई थी। इससे गलियों में कीचड़ थी। तुलसी साहब के पैर कीचड़ में सने हुए थे। तुलसी साहब को आते देख सेठ दिलवाली सिंह की माताजी और अन्य महिलाएँ बहुत आनंदित हुईं। उन्होंने मत्था टेका और विनती की कि वे उन्हीं कपड़ों पर विराजें। तुलसी साहब मिट्टी और कीचड़ में सने पैरों के साथ उन बहुमूल्य वस्त्रों पर चलकर बैठ गये। सद्गुरु के प्रेम और भक्ति में मग्न, घर की महिलाओं का ख्याल कपड़ों पर मिट्टी लगने की ओर नहीं गया। उनकी विनती स्वीकार करके तुलसी साहब ने उन वस्त्रों पर चरण रखे। यह देखकर वे बहुत प्रसन्न हुईं। तुलसी साहब ने कहा-अरे! मैंने तो तुम्हारे कीमती कपड़े मिट्टी से बिगाड़ दिये। इसपर सेठ दिलवाली सिंह की माता ने प्रेम और ममता के साथ उत्तर दिया-नहीं, साहबजी! कुछ नहीं बिगड़ा है। आपने तो हमें अपने दर्शन से कृतार्थ कर दिया। सब कुछ आपका ही है, इन कपड़ों में हमारा क्या है? उनकी भक्ति-भावना को देखकर तुलसी साहब ने कहा-मै तुमसे बहुत खुश हूँ। जो भी चाहो, माँग लो। मैं खुशी से दे दूँगा।

इसपर सेठ दिलवाली सिंहजी की माताजी ने अर्ज किया-"आपकी दया-मेहर से हमारे पास सब कुछ है, किसी चीज की जरूरत नहीं है। परन्तु....., अपनी पूत्रावधू की ओर संकेत करते हुए उन्होंने विनती की कि ‘महामाया को कुछ चाहिए। सेठ दिलवाली सिंह की धर्मपत्नी महामाया को कोई पुत्रा नहीं था। तुलसी साहब ने दया-मेहर की उसी मौज में फरमाया-"हाँ, इसे पुत्र प्राप्त होगा परन्तु उसे साधरण मनुष्य मत समझना।
अगस्त, 1818 में सेठ दिलवाली सिंह और महामाया को पुत्रारत्न की प्राप्ति हुई। पुत्रा का नाम शिवदयाल सिंह रखा गया, जो आगे जाकर परम संत के रूप में प्रकट हुए और राधस्वामीजी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए।
इस प्रकार अपने शिशु-काल से ही स्वामीजी महाराज तुलसी साहिब के निकट सम्पर्क में थे। स्वामीजी महाराज को तुलसी साहिब के दर्शन और सत्संग का लाभ तुलसी साहिब के अंतिम समय तक प्राप्त होता रहा। स्वामीजी महाराज की अपने सद्गुरु के प्रति बड़ी गहरी प्रीति और श्रद्धा थी। तुलसी साहिब के अन्य शिष्यों की तरह स्वामीजी भी उन्हें ‘साहिब’ और ‘साहिबजी’ कहकर पुकारते थे।
तुलसी साहब के अंतिम कुछ वर्षों में उनकी रूह अधिकतर आंतरिक रूहानी मंडलों में रहती थी और कमर के नीचे का उनका शरीर बहुत सुन्न रहता था। इसलिए वे ज्यादा चल-फिर नहीं सकते थे। शिष्य उन्हें अपने कंधें पर अथवा पालकी में बिठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे। एक बार तुलसी साहिब स्वामीजी के साथ किसी मेले में तशरिफ लेने गये। दोनों मेले में सड़क के एक किनारे पर खड़े हो गये, जहाँ से दर्शक आ और जा रहे थे। अपनी कृपा और करुणा के प्रवाह में तुलसी साहिब ने स्वामीजी से कहा कि इस समय जो कोई भी आकर उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम करेगा, उसकी आत्मा तत्काल आंतरिक रूहानी मंडलों में पहुँचा देंगे। यद्यपि तुलसी साहिब यह बख्शिश करने के लिए तैयार थे, परन्तु शायद कोई उसे लेनेवाला न था।
मेले में आने-जानेवाले सैकड़ों व्यक्तियों में से केवल एक स्त्री, जो कि वेश्या थी, तुलसी साहिब को देखकर रुकी, उनके सामने आयी और श्रद्धापूर्वक उनको मत्था टेका। तुलसी साहब ने स्वामीजी से कहा कि वे अपना हाथ उसके सिर पर रखें। इसपर स्वामीजी महाराज ने कहा कि बख्शिश तो तुलसी साहब प्रदान कर रहे हैं, पर इसके लिए उपयोग स्वामीजी के हाथ का किया जा रहा है। तुलसी साहिब ने फरमाया कि आगे चलकर स्वामीजी को भी यही कार्य करना पडे़गा। दोनों संतों की कृपा और दया-मेहर से उस स्त्री की आँखें खुल गयीं, उसे अंतर में रूहानी नजारे दिखाई देने लगे और उसकी आत्मा सूक्ष्म मंडलों में चली गयी कुछ समय के बाद, जब उसकी आत्मा वापस शरीर में आयी, तो उसने आदरपूर्वक और भक्ति के साथ मत्था टेका और चली गयी।
तुलसी साहब का स्वामीजी के प्रति बहुत प्यार था और स्वामीजी उन्हें अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में बड़ी भक्ति और आदर की दृष्टि से देखते थे। जब तुलसी साहब का अंतिम समय निकट आया, तो उन्होंने स्वामीजी को बुलवाया, जिन्हें वे ‘मुंशीजी’ कहकर पुकारा करते थे। जब स्वामीजी को संदेश मिला और पता चला कि तुलसी साहिब इस संसार को छोड़ रहे हैं, तो उसी समय, जिस अवस्था में थे, उसी में बगैर जूते पहने हाथरस की ओर दौड़ पड़े। कहते हैं कि अपने प्यारे सतगुरु के अंतिम दर्शन के लिए स्वामीजी महाराज ने करीब बीस मील की दूरी भागते हुए तय की। जबतक स्वामीजी न पहुँचे, तुलसी साहब ने चोला नहीं छोड़ा। स्वामीजी के पहुँचने पर तुलसी साहब ने एक अंतिम गहरी दृष्टि उनपर डाली और ज्योति-जोत में समा गये।
तुलसी साहब विनम्र और सहिष्णु थे। उनका व्यवहार सभी के प्रति प्रेेमपूर्ण था। जहाँ अपने विचारों को व्यक्त करने में वे दृढ़ और स्पष्ट थे, वहीं अपने व्यवहार में सौम्य और मृदु थे। कई बार विद्वान्, पंडित और पुरोहित अथवा मठाधीश उनसे बहस करने आते थे। कभी-कभी तो वे उनसे लड़ने के विचार से आते और कठोर वचनों का प्रयोग करते। परन्तु तुलसी साहब हमेशा उठकर उनका स्वागत करते, झुककर प्रणाम करते और पधरकर उनकी कुटिया को पवित्र करने के लिए उनका आभार मानते। वे उन्हें अपने से उॅंचे आसन पर बिठाते और उनके आक्रोशपूर्ण कठोर वचनों को बड़े धैर्य से सुनते। घटरामायण में ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जिनसे प्रकट होता है कि तुलसी साहब किस प्रकार अपनी नम्रता तथा अपने सौम्य और प्रेमपूर्ण व्यवहार के द्वारा अपने विरोधीयो का हृदय जीत लेते थे।
अपने शिष्यों के प्रेम और भक्ति का तुलसी साहब बहुत आदर करते थे। एक बार वे आगरा गये और पन्नी गली में स्वामीजी महाराज

के यहाँ पहुँचे। यह सुनकर कि सतगुरु शहर में आये हैं, कुछ महिलाएँ जो कि पास ही रहती थीं, दर्शन के लिए दौड़ी आयीं। उनमें से कई घर के कामकाज में लगी हुई थीं और जैसी थीं, वैसी ही स्वामीजी के घर की ओर दौड़ पड़ीं। आकर उन्होंने बड़ी भक्ति के साथ तुलसी साहब को मत्था टेका और उनके पास बैठ गयीं। तुलसी साहब के एक शिष्य ने जब देखा कि उनके कपड़ों में से दुर्गन्ध् आ रही है, तो उनसे कहा कि वे दूर हटकर बैठें क्योंकि उनके कपड़ों में से पसीने की बदबू आ रही है। तुलसी साहब ने उसे रोकते हुए कहा, भाई! इन्हें बैठे रहने दो। तुम्हें इनके प्रेम की खुशबू का पता नहीं। तुम नहीं जानते कि किस भक्ति-भावना के साथ ये यहाँ आयी हैं। तुम्हें इनमें से बदबू आती है, मुझे नहीं आती।य्
शेख तकी नामक एक पफकीर हज से लौट रहा था। संयोग से उसने अपना तम्बू तुलसी साहब की कुटिया के सामने लगाया। इस प्रकार उसे तुलसी साहब से मुलाकात और बातचीत का मौका मिला। परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग के बारे में अपने वार्तालाप में तुलसी साहब ने शेख तकी को समझाया कि मनुष्य का शरीर ही असली मस्जिद है और इसी में खुदा रहता है। इंसान के हाथों से बनायी हुई ईंट-पत्थरों की मस्जिद में वह नहीं रहता। उनसे मिलने का रास्ता भी इन्सान के शरीर में ही है। वह रास्ता तीसरी आँख अथवा ‘नुक्ताए सवैदा’ मेें से शुरू होता है। आँखों के इस केन्द्र में सारी सृष्टि का भेद छिपा हुआ है। ‘कुन’ शब्द या दिव्य धुन खुदा के महल दरवाजे की कुंजी है, लेकिन यह केवल पूरे सतगुरु से ही मिल सकती है-
दिल का हुजरा साफ कर, जाना के आनेे के लिए ।
ध्यान गैरों का उठा, उसको बिठाने के लिए ।।
चश्मे दिल से देख यहाँ, जो जो तमाशे हो रहे ।
दिलसताँ क्या क्या है, तेरे दिल सताने के लिए ।।
एक दिल लाखों तमन्ना, उस पै और ज्यादा हविस ।
फिर ठिकाना है कहाँ, उसको बिठाने के लिए ।।
नकली मंदिर-मस्जिदों में, जाय सद अफसोस है ।
कुदरती मस्जिद का साकिन, दुख उठाने के लिए ।।

कुदरती काबे की तू, मेहराब में सुन गौर से ।
है आ रही धुर से सदा, तेरे बुलाने के लिए ।।
क्यों भटकता फिर रहा तू, ऐ तलाशे यार में ।
रास्ता शहरग में है, दिलवर पै जाने के लिए ।।
मुर्शिदे कामिल से मिल, सिदक और सबूरी से तकी ।
जो तुझे देगा फहम, शहरग को पाने के लिए ।।
गोश बातिन हो कुशादा, जो करे कुछ दिन अमल ।
ला इलाह अल्लाह हो, अकबर पै जाने के लिए ।।
यह सदा तुलसी की है, आमिल अमल कर ध्यान दे ।
कुन कुराँ में है लिखा, अल्लाहु अकबर के लिए ।।
सभी संतों की शिक्षा अपने मूल रूप में एक ही है। वे सभी ‘परमात्मा के बादशाहत’ का जिक्र करते हैं, जो कि हमारे अंदर में है। वे उसकी प्राप्ति का मार्ग बताते हैं और वहाँ जाने की विधी सिखाते हैं। वे अन्य संतों ने भिन्न कोई शिक्षा का दावा नहीं करते। परन्तु उनके जाने के बाद उनके शिष्य धीरे धीरे उनकी असली शिक्षा को भूलकर बाहरमुखी कर्मों, रिवाजों आदि में उलझ जाते हैं। उनके निर्मल रूहानी संदेश को वे बाहरी परिपाटियों और कर्मकाण्डों का रूप दे देते हैं। असली गुर  (भेद) को खोकर वे छिलके समेटने में लग जाते हैं।
तुलसी साहब के संसार में आने से पहले पिछले संतों के अनुयायी अपने सतगुरु के मूल संदेशों को भूलकर पंथ बनाये बैठे थे। कबीर, दादू, पलटू, दरिया आदि संतों के अनुयायी कबीर-पंथी, दादू-पंथी, पलटू-पंथी, दरिया-पंथी के नाम अपना चुके थे।
तुलसी साहब ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे कोई नया मार्ग नहीं बतला रहे हैं, बल्कि वही शिक्षा दे रहे हैं, जो कबीर साहब, नानक, साहब, दादू साहब तथा अन्य संतों की है। अपनी इस बात की पुष्टि में तुलसी साहब अपने ‘घटरामायण’ में कबीर, रविदास, दादू तथा अन्य संतों के शब्दों का उदाहरण देते हैं। तुलसी साहब ने पहली बार सभी संतों की शिक्षा ‘संत-मत’ वाक्य का प्रयोग किया और इस प्रकार विभिन्न संतों की शिक्षा की एकता और समानता प्रकट करने का प्रयास किया।

तुलसी साहब की रचनाओं में शब्दावली, रत्नसागर, घटरामायण तथा एक छोटी अपूर्ण पुस्तिका पद्य सागर है। शब्दावली में तुलसी साहब की फुटकर रचनाओं, पदों, शब्दों आदि का संग्रह है। इनमें से अधिकांश पद संगीत के विभिन्न रागों पर आधरित हैं और संतमत के विभिन्न अंगों पर प्रकाश डालते हैं। ‘घटरामायण’ और ‘रत्नसागर’ कथोपकथन की शैली में लिखी गयी है। इसमें तुलसी साहब शिष्यों और जिज्ञासुओं के प्रश्नों का समाधन करते हैं। ‘घटरामायण’ में तुलसी साहब के समय मे प्रचलित विभिन्न के सिद्धान्तो का विवेचन तथा संतमत की दृष्टि से उनकी व्याख्या है। रत्नसागर के विषय हैं-सृष्टि की रचना, स्वर्ग और नरक, काल, मन, मृत्यु, संतों की शिक्षा, संतों की दया, अंदर के भेद आदि। तुलसी साहब की सभी रचनाओं के समान ही रत्नसागर में भी पूरे सतगुरु की महिमा, सतगुरु की आवश्यकता और उनके सत्संग के लाभ पर काफी लिखा गया है। मृत्यु के समय संत किस प्रकार अपने शिष्य की आत्मा की सँभाल करते हैं, रत्नसागर में इसका भी स्पष्ट वर्णन किया गया है।
तुलसी साहब की रचनाओं में संस्कृत, अरबी और फारसी भाषा के शब्दों का काफी प्रयोग हुआ है। तुलसी साहब के समय में दक्षिण में कई राज्यों में फारसी राजकीय भाषा थी, अतएव पेशवा परिवार से संबंंधितहोने के कारण तुलसी साहब को फारसी का अच्छा ज्ञान रहा होगा। परन्तु इसके साथ ही आपकी रचनाओं में ब्रज, अवधी, मराठी, राजस्थानी ;मारवाड़ीद्ध, गुजराती, पंजाबी और मैथिली शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि अन्य संतों की तरह तुलसी साहब भी उत्तरप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, पंजाब, बिहार आदि प्रदेशों में बराबर यात्राएँ करते रहे होंगे। परन्तु आपका स्थायी निवास-स्थान हाथरस नगर की सीमा पर स्थित जोगिया ग्राम में एक कुटिया ही रहा। यहाँ आप अपने अंतिम समय तक रहे तथा सन् 1843 में अस्सी वर्ष की आयु में धुरधम को प्रयाण कर गये।
सुरति सिरोमनि घाट, गुमठ मठ मृदंग बजै रे ।।टेक।।
किंगरी बीन संख सैनाई, बंकनाल की बाट ।        
चितवत चाट खाट पर जागी, सोवत कपट कपाट ।।1।।   

मुरली मधुर झाँझ झनकारी, रँभा नचत बैराट ।        
उड़त गुलाल ज्ञान गुन गाँठी, भर-भर रंग रस माट ।।2।।   
गाई गैल सैल अनहद की, उठै तान सुर ठाट ।        
लगन लगाइ जाइ सोइ समझी, सुरत सैल नभ पफाट ।।3।।  
तुलसी निरख नैन दिन राती, पल-पल पहरौ आठ ।       
यहि विधि सैल करै निस वासर, रोज तीन सै साठ ।।4।।  
    भावार्थ-पिण्ड में सुरत का सबसे उत्तम घाट (षट्चक्र या आज्ञा-चक्र के केन्द्र-विन्दु) के मठ की गुमटी में अनहद नाद का मृदंग बजता है।।  इसके आगे बंकनाल वा पतले नल (जिसके अंदर के मार्ग पर कठिनाई से चला जा सकेद्), में मजीरा, बीन, शंख और शहनाई बजती है। जिसको दृष्टियोग द्वारा देखने का चस्का लग गया है, वह खटिये पर सोया हुआ-सा प्रतीत होता हैऋ परन्तु जगता रहता है।।1।। वह मुरली की मधुर  ध्वनि, झाँझ की झनकार और विश्व-विराट् रूप रंभा अप्सरा का नाच देखता है अर्थात् विश्व विराट् की गति और गति-ध्वनि देखता और सुनता है। उसकी गाँठ से ज्ञान-गुण का गुलाल उड़ता है अर्थात् उसके द्वारा ज्ञान का प्रचार होता रहता है और उसके सब रंग-रूप माटें ज्ञान-रंग के रस से भरे रहते हैं।।2।। यह मैंने अनहद में यात्रा करके वर्णन किया है। वहाँ अनेक ध्वनियाँ उठती रहती हैं। जिसने इस साध्न में मन लगाया है और जो सुरत से यात्रा करके एक प्रकार के आकाश से दूसरे प्रकार के आकाश में चलकर गया है, उसी ने इसको समझा है।।3।। तुलसी साहब कहते हैं कि पल-पल, आठो पहर, दिन-रात आँख से निरखो ;देखोद्ध अर्थात् दृष्टि-साध्न करो और इसी तरह से दिन-रात, सब दिन यात्रा करते रहो।।4।।
    अजब अनार दो बहिश्त के द्वार पै ।
                              लखै दरवेश कोई पफकीर प्यारा ।।1।।
    ऐनि के अध्र दो चश्म के बीच में ।
                             खसम को खोज जहाँ झलक तारा ।।2।।
    उसी बीच पफक्त खुद खुदा का तख्त है ।
                            सिश्त से देख जहाँ भिस्त सारा ।।3।।

तुलसी सत मत मुरशिद के हाथ है ।
                            मुरीद  दिलरूह  दोजख न्यारा ।।4।।


    भावार्थ-स्वर्ग के द्वार पर आश्चर्यमय दो अनार लटकते हैं, जिसको साधु का प्यारा कोई साध्क देखते हैं।।1।। आँख के शून्य में दोनों आँखों के बीच के अन्दर प्रभु को खोजो, जहाँ तारा झलकता है।।2।। केवल उसी के अन्दर स्वयं प्रभु का सिंहासन है। शिस्त करके देखो, जहाँ असली स्वर्ग है।।3।। तुलसी साहब कहते हैं कि सत्य और निश्चित सिद्धान्त  गुरु के हाथ में है। जो मन और सुरत से चेला बनता है, वह नरक से न्यारा हो जाता है।।4।।

            ।। मूल पद्य ।।
आरति संग सतगुरु के कीजै। अन्तर जोत होत लख लीजै ।।1।।
पाँच तत्त्व तन अग्नि जराई। दीपक चास प्रकाश करीजै ।।2।।
गगन थाल रवि ससि पफल पफूला। मूल कपूर कलश ध्र दीजै ।।3।।
अच्छत नभ तारे मुक्ताहल। पोहप माल हिय हार गुहीजै ।।4।।
सेत पान मिष्टान्न मिठाई। चन्दन धूप दीप सब चीजै ।।5।।
झलक झाँझ मन मीन मँजीरा। मधुर  मधुर  धुनि मृदंग सुनीजै ।।6।।
सर्व सुगन्ध् उड़ि चली अकाशा। मधुरकर कमल केलि धुनि  धीजै।।7।।
निर्मल जोत जरत घट माहीं। देखत दृष्टि दोष सभ छीजै ।।8।।
अधर धार अमृत बहि आवै। सत-मत द्वार अमर रस भीजै ।।9।।
पी-पी होय सुरत मतवाली। चढ़ि-चढ़ि उमगि अमी रस रीझै ।।10।।
कोट भान छवि तेज उजाली। अलख पार लखि लाग लगीजै ।।11।।
छिन-छिन सुरत अधर पर राखै। गुरु-परसाद अगम रस पीजै ।।12।।
दमकत कड़क-कड़क गुरुधमा। उलटि अलल तुलसी तन तीजै ।।13।।
    भावार्थ-सद्गुरु के संग प्रभु परमात्मा की आरती कीजिए और अन्तर में ज्योति होती है, उसे देख लीजिए।।1।। तन के पाँच तत्त्वों की अग्नि को जला, दीपक बालकर प्रकाश कर लीजिए। इसका तात्पर्य यह है कि ध्यान-अभ्यास करके पाँच तत्त्वों के भिन्न-भिन्न रंगों के प्रकाशों को देखिए और इसके अनन्तर दीपक-टेम की ज्योति का भी दर्शन कीजिए।।2।। शून्य के थाल में सूर्य और चन्द्र पफल-पफूल हैं और इस पूजा के मूल या आरम्भ में कपूर अर्थात् श्वेत ज्योति-विन्दु का कलश-स्थापन कीजिए।।3।। अन्तराकाश में दर्शित सब तारे रूप मोतियों का अच्छत ;अरवा चावल, जिसका नैवेद्य पूजा में चढ़ाते हैं। और ऊपर-कथित फूलों का हार गूँथकर हृदय में पहन लीजिए अर्थात् अपने अन्दर में उन फूलों का सपे्रम दर्शन कीजिए।।4।। पान, मिठाई, मिष्टान्न, चन्दन, धूप और दीपक सब-के-सब उजले यानी प्रकाश हैं।।5।। झलक अर्थात् प्रकाश में झाँझ, मजीरे और मृदंग की मीठी ध्वनियों को मीन-मन से अर्थात् भाठे से सिरे की ओर चढ़नेवाले मन से सुनिए।।6।। शरीर में बिखरी हुई सुरत की सब धर-रूप सुगन्ध् आकाश में उठती हुई चलती है और उस मण्डल में वह भ्रमर-सदृश खेलती हुई अनहद ध्वनि से संतुष्ट होती है।।7।। शरीर के अन्दर पवित्रा ज्योति जलती है। दृष्टि से दर्शन होते ही सब दोष नाश को प्राप्त होते हैं।।8।। अधर (आकाशद्) की धरा में अमृत बहकर आता है, उस धरा में सत्य-ध्र्म के द्वार पर आरती करनेवाला अभ्यासी अमर-रस में भींजता है।।9।। उस अमर-रस को पीकर सुरत मस्त होती है और विशेष-से-विशेष ऊपर चढ़ाई करके और उल्लसित होकर अमृत-रस में रीझती है।।10।। करोड़ों सूर्य के सदृश प्रकाशमान सौन्दर्य प्रकाशित है, अलख के पार लखकर संबंध् लगा लीजिए।।11।। सुरत को क्षण-क्षण अधर पर रखे, गुरु-प्रसाद से अगम रस पीजिए।।12।। तुलसी साहब कहते हैं कि गुरु-धाम(परम पुरुष-पद) चमकता हुआ ध्वनित होता है। हे सुरत! तू अलल पक्षी की भाँति उलटकर अर्थात् बहिर्मुख से अन्तर्मुख होकर तीनों शरीरों को छोड़ दे।।13।।
।। जीव का निबेरा, चैपाई ।।
तुलसी निरख देखि निज नैना । कोइ कोइ संत परखिहैं बैना ।।1।।
जो कोइ सन्त अगम गति गाई । चरन टेकि पुनि महूँ सुनाई ।।2।।
अब जीवन का कहूँ निबेरा । जासे मिटै भरम बस बेरा ।।3।।
जब या मुक्ति जीव की होई । मुक्ति जानि सतगुरु पद सेई ।।4।।
सतगुरु संत कंज में बासा । सुरत लाइ जो चढ़ै अकासा ।।5।।

स्याम कंज लीला गिरि सोई । तिल परिमान जान जन कोई ।।6।।
छिन छिन मन को तहाँ लगावै । एक पलक छूटन नहिं पावै ।।7।।
ड्डुति ठहरानी रहे अकासा । तिल खिरकी में निसदिन वासा ।।8।।
गगन द्वार दीसै एक तारा । अनहद नाद सुनै झनकारा ।।9।।
अनहद सुनै गुनै नहिं भाई । सूरति ठीक ठहर जब जाई ।।10।।
चूवै अमृत पिवै अघाई । पीवत पीवत मन छकि जाई ।।11।।
सूरत साध् संध् ठहराई । तब मन थिरता सूरति पाई ।।12।।
सूरति ठहरि द्वार जिन पकरा । मन अपंग होइ  मानो जकरा ।।13।।
चमकै बीज गगन के माईं । जबहिं उजास पास रहै छाई ।।14।।
जस जस सुरति सरकि सतद्वारा । तस तस बढ़त जात उजियारा ।।15।।
सेत स्याम ड्डुति सैल समानी । झरि झरि चूवै कूप से पानी ।।16।।
मन इस्थर अस अमी अघाना । तत्त पाँच रंग विधि बिखाना।।17।।
स्याही सुरख सपफेदी होई । जरद जाति जंगाली सोई ।।18।।
तल्ली ताल तरंग बखानी । मोहन मुरली बजै सुहानी ।।19।।
मुरली नाद साध् मन सोवा । विष रस बादि विधि सब  खोवा ।।20।।
खिरकी तिल भरि सुरति समाई । मन तत देखि रहै टकलाई ।।21।।
जब उजास घट भीतर आवा । तत्त तेज और जोति दिखावा ।।22।।
जैसे मंदिर दीपक बारा । ऐसे जोति होत उजियारा ।।23।।
जोति उजास पफाटि पुनि गयऊ । अंदर तेज चंद अस भयऊ ।।24।।
देखै तत सोइ मन है भाई । पुनि चन्दा देखै घट माईं ।।25।।
चन्द्र उजास तेज भया भाई । फूला चन्द चाँदनी छाई ।।26।।
सूरति देखि रहै ठहराई । ज्यों उजियास बढ़त जिमि जाई ।।27।।
ज्यों ज्यों सुरति चढ़ी चलि गयऊ । सेता ठौर ठाम लखि लयऊ ।।28।।
देख सैल ब्रह्माण्ड समाई । तारा अनेक अकास दिखाई ।।29।।
महि और गगन देखि उर माईं । और अनेकन बात दिखाई ।।30।।
कछु कछु दिवस सैल अस कीना । ऊगा भान तेज को चीना ।।31।।
तारा  चन्द तेज मिटि गयऊ । जिमि मध्यान भान घट भयऊ ।।32।।
ज्यों दुपहैर गगन रवि छाई । ता से उजास भया घट माईं ।।33।।
ताके मधिमें निरखि निहारा । घट में देखा अगम पसारा ।।34।।

सात दीप पिरथी नौ खंडा । गगन अकाश सकल ब्रह्मण्डा ।।35।।
समुन्दर सात प्रयाग पद बेनी । गंगा जमुना सरसुती भैनी ।।36।।
औरे नदी अठारा गण्डा । ये सब निरखि परा ब्रह्मण्डा ।।37।।
चारो खानि जीव निज होई । अंडज पिंडज उष्मज सोई ।।38।।
अस्थावर चर अचर दिखाई । ये सब देखा घट के माईं  ।।39।।
भिनि भिनि जीवन कर विस्तारा । चारि लाख चैरासी धरा ।।40।।
और पहार नार बहुतेरा । जो ब्रह्माण्ड में जीव बसेरा ।।41।।
कछु कछु दिवस सैल अस कीना । तीनि लोक भीतर में चीना ।।42।।
जो जग घट घट माहिं समाना । घट घट जग जीव माहिं जहाना ।।43।।
ऐसे कइ दिन बीति सिराने । एक दिवस गये अधरठिकाने ।।44।।
परदा दूसर पफोड़ि उड़ानी । सुरत सोहागिन भइ अगवानी ।।45।।
शब्द सिन्ध् में जाइ सिरानी । अगम द्वार खिड़की नियरानी ।।46।।
चढ़ि गइ सूरति अगम ठिकाना । हिय लखि नैना पुरुष पुराना ।।47।।
तामें पैठि अधर में देखा । रोम-रोम ब्रह्मण्ड का लेखा ।।48।।
अंड अनेक अन्त कछु नाहीं । पिंड ब्रह्मण्ड देखि हिय माँहीं ।।49।।
जहँ सतगुरु पूरन पद वासी । पदम माहिं सतलोक निवासी ।।50।।
सेत बरन वह सेतइ साईं । वहँ सन्तन ने सुरति समाई ।।51।।
सत्तहि लोक अलोक सुहेला । जहँ वह सुरति करै निज केला ।।52।।
सूरति सन्त करै कोइ सैला । चैथा पद सत नाम दुहेला ।।53।।
परदा तीसर पफोड़ि समानी । पिंड ब्रह्मण्ड नहीं अस्थानी ।।54।।
जहाँ वो अगम अगाधि अघाई । जहाँ की सतगति सन्तन पाई ।।55।।
महुँ उन लार लार लरकाई । उन संग टहल करन नित जाई ।।56।।
महुँ पुनि चीन्ह लीन्ह वह धमा । बरनि न जाइ अगमपुर ठामा ।।57।।
निःनामी वह स्वामी अनामी । तुलसी सुरति तहाँ ध्रि थामी ।।58।।
जो कोइ पूछै तेहि कर लेखा । कस कस भाखों रूप न रेखा ।।59।।
तुलसी नैन सैन हिय हेरा । सन्त बिना नहिं होइ निबेरा ।।60।।
निज नैना देखा हिय आँखी । जस जस तुलसी कह-कह भाखी ।।61।।
 पिंड माहिं ब्रह्मण्ड, ताहि पार पद तेहि लखा ।
 तुलसी तेहि की लार, खोलि तीनि पट भिनि भई ।।

उपर्युक्त चैपाइयों को पढ़ने से पता चलता है कि इस मानव शरीर के अंदर क्या-क्या विद्यमान हैं, उन सभी चीजों का पता लगाने व देखने के लिए हमें सच्चे सद्गुरु की युक्ति का सहारा लेना पड़ेगा। अन्यथा ये सारी रहस्यमयी जीवन को समझना, उस परमात्मा का सही- सही पता लगना मुश्किल है। गुरु से युक्ति लेकर भक्ति करें, तब ये सब अपने शरीर के अंदर सहज में ही प्राप्त कर सकते हैं।
    अपने घट के अंदर देवी-देवता, आकाश-पाताल, धरती, सूरज, चॉंद, सितारे, नक्षत्रा, पर्वत, समुद्र, अनेक लोक-लोकान्तर देख सकते हैं। चारो खानि, ॠद्धि-सिद्धि देवी-देवताओं के दर्शन कर पायेंगे। आप अपना निज रूप को जान पायेंगे। प्रभु परमात्मा का धाम तक पहुँच जाएँगे। ऐसा योग के द्वारा ही संभव है। जिसका पैठ सुषम्ना में हो जाता है। नितप्रति ध्यान में संलग्न रहते हैं। वे अधंकार, प्रकाश, शब्द के मंडलों को पार कर निःशब्द परमात्मा के धाम में पहुँच जाते हैं। जहाँ से यह शक्ल का विस्तार हुआ, सृष्टि की रचना हुई, इसको भी जान लेते हैं। परमात्मा एक था, उनकी मौज हुई। मैं एक हूँ, अनेक हो जाउ, तो वे एक से अनेक हो गये। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-‘एको¿हं बहुस्याम्।’
    उस परमात्मा के सिवा कुछ भी न था, न धरती  , सूरज, चाँद, सितारे। दिन-रात, पाँच तत्त्व नहीं थे। नदी, नाला, पाताल नहीं था। ब्रह्मा, विष्णु, महेश नहीं थे। जन्म-मरण सुख-दुःख नहीं था। उदय-अस्त, स्वर्ग-नरक नहीं था। न कोई जाति-पाँति, सिद्ध संन्यास, तपसी-   साधक, ज्ञानी, वैरागी, योगी, जंगम, गृहस्थ, पुजारी नहीं थे और न तंत्रा-मंत्रा का, धर्म -कर्म का ज्ञान, पूजा-पाठ था। न चारो वर्ण ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, शूद्र था। गाय, गायत्राी, देश, काल, तीर्थ-व्रत, होम, यज्ञ, मुल्ला, काजी, शेख-हाजी, नेकी-बदी, वेद-पुराण, मंदिर-मस्जिद और भगवान। शिव-शक्ति, श्रद्धा-भक्ति का भी था न नामोनिशान। उसकी (परमात्मा) की मेहरबानी सब पर जान। क्या है करिश्मा उसकी पहचान। बिन गुरु भक्ति कुछ भी न जान।
    गुरु नानकदेवजी फरमाते हैं-परमात्मा की कारीगरी आश्चर्यमय है। इस शरीर के नौ दरवाजे संसार के काम करने के लिए बनाया है और दशवें दरवाजे ( Third eye) पर वह परमात्मा आसन लगाकर स्वयं बैठा है।
।। गजल ।।
सुन ऐ तकी न जाइयो जिनहार देखना ।।
अपने में आप जलवए दिलदार देखना ।।
पुतली में तिल है तिल में भरा राज कुल का कुल ।।
इस परदये सियाह के जरा पार देखना ।।
चैदह तबक का हाल अयाँ हो तुझे जरूर ।।
गापिफल न हो ख्याल से हुशियार देखना ।।
सुन लामकाँ पै पहुँच के तेरी पुकार है । 
है आ रही सदा से सदा यार देखना ।।
मिलना तो यार का नहीं मुश्किल मगर तकी । 
दुशवार तो ये है कि है दुशवार देखना ।।
तुलसी बिना करम किसी मुर्शद रसीदा के ।।
राहे निजात दूर है उस पार देखना ।।
    भावार्थ-ऐ-शेख तकी ! सुनो, परमात्मा को खोजने के लिए बाहर कहीं हर्गिज नहीं जाना। अपने शरीर के ही अंदर परमात्मारूपी प्रेमपात्रा का प्रकाश देखना।।1।। आँख की पुतली के मध्य-स्थित तिल (विन्दु या दृष्टि) में परमात्मा का पूरा-का-पूरा रहस्य भरा हुआ है। बंद नयनाकाश के अधंकार-रूपी काले परदे के जरा पार होकर देखना, तब तुम्हें रहस्य का पता लग जाएगा।।2।। आंतरिक साधना करने पर तुम्हें अनिवार्य रूप से चौदहों लोकों की बातें मालूम हो जाएँगी। ख्याल (ध्यान, सुरत) से असावधन न रहना; सावधन होकर देखते रहना।।3।। आज्ञाचक्रकेन्द्रविन्दु में पहुँचकर सुनो; वहाँ जो ध्वनियाँ हो रही हैं, वे तुम्हें पुकारने की परमात्मा की ध्वनियाँ हैं। वे पुकार की ध्वनियाँ सदा से तुम्हारे लिए आ रही हैं। उन ध्वनियों की डोर पकड़कर तुम परमात्मा-रूपी मित्रा के पास जाकर उसके दर्शन कर सकते हो।।4।। ऐ शेख तकी ! परमात्मा-रूपी मित्रा का मिलना कठिन नहीं है कठिन तो उसके देखने (साक्षात्कार करने) का साधन है।।5।। संत तुलसी साहब कहते हैं कि पहुँचे हुए किन्हीं सद्गुरु की दया के बिना मुक्ति का मार्ग पाना और संसार के पार (परमात्म-पद) देखना कठिन है।।6।।
    टिप्पणी-1. आँख की पुतली के मध्य जो तिल है, उसी होकर दृष्टिधरा बाहर की ओर निकलती है। देखने की शक्ति को दृष्टि कहते हैं। दृष्टिधराओं को जोड़कर आज्ञाचक्र के केन्द्रविन्दु में देखने पर परमात्मा का रहस्य खुलने लगता है। दृष्टि में बड़ी शक्ति छिपी हुई है-मनुष्य में यह निगाह ऐसी बड़ी ताकतवर चीज है कि जिसने बड़े-बड़े छिपे हुए साइंस और विद्याओं को निकालकर दुनिया में जाहिर किया है और सिद्धि  वगैरह की असलियत और मसालों का पता जिससे कि वह हो सकती है, सिवाय इसके और किसी से नहीं लग सकता।"(घटरामायण की भूमिका: बाबा देवी साहब)। 2. शेख तकी एक मुसलमान था। वह संत तुलसी साहब के ज्ञान से प्रभावित होकर उनका शिष्य बन गया था। उपर के तीन पद्य उसी को संबोधित करके कहे गये हैं। ‘तकी’ का शाब्दिक अर्थ होता है-संयमी, इन्द्रियनिग्रही।
।। गजल ।।
अरे ऐ तकी तकते रहो मुर्शद ने ये पंजा दिया । 
बेहोश हो मत छोडि़यो गर चाहै तू जलवा पिया ।।
होगा पफजल दर्गाह तक खौपफो खतर की जा नहीं । 
सीधे चला जाना वहाँ मुर्शद ने यह पफतवा दिया ।।
मनसूर सरमद, बूअली और शम्श मौलाना हुए । 
पहुँचे सभी इस राह से जिसने कि दिल पुख्ता किया ।।
यह राह मंजिल इश्क है पर पहुँचना मुश्किल नहीं । 
मुश्किल कुशा है रोबरू जिसने तुझे पंजा दिया ।।
तुलसी कहै सुन ऐ तकी यह राज बातिन है जुदा । 
रखना हिपफाजत से इसे तुझको निशाँ ऊँचा दिया ।।
    भावार्थ-ऐ शेख तकी ! गुरु ने तुम्हें शरीर के अंदर देखने का  जो भेद (दृष्टियोग) बताया है, उसके अनुसार निशाने को देखते रहो। यदि तुम परमात्मा के प्रकाश-रूपी अमृत का पान करना चाहते हो, तो तुम असावधन होकर अभ्यास करना छोड़ नहीं देना।।1।। डर-जोखिम की कोई बात नहीं है। यदि तुम परमात्मा के आज्ञाचक्रकेन्द्र विन्दुरूपी दरबार में अविचल रूप से अवस्थित रहोगे, तो उसकी दया अवश्य होगी। तुम बेहिचक और निर्भय होकर आगे बढ़ते रहना, गुरु ने यह आदेश दिया है।।2।। मंसूर, सरमद, बूअली, शम्स मौलाना आदि जितने पूरे फकीर हुए हैं, सभी इसी राह (आज्ञाचक्रकेन्द्रविन्दुरूपी) होकर गंतव्य स्थान तक पहुँचे हैं, जिन्होंने अपने दिल को मजबूत किया था-हृदय में हिम्मत बॉंधी थी।।3।। मंजिल (गंतव्य स्थान, परमात्म-पद) तक जाने का मार्ग प्रेम का है। मंजिल तक पहुँचना मुश्किल नहीं है; क्योंकि मार्ग की कठिनाइयों को दूर करनेवाले सद्गुरु सदा तुम्हारे आमने-सामने रहते हैं-तुम्हारी निगरानी करते रहते हैं, जिन्होंने तुम्हें आदेश दिया है।।4।। संत तुलसी साहब कहते हैं कि ऐ शेख तकी ! सुनो, यह आंतरिक भेद सबसे भिन्न है। इसको तुम  सावधनी से छिपाकर रखना। तुम्हें बहुत उफँचे लक्ष्य का पता बताया गया है।।5।।
    संत तुलसी साहब हाथरसी के स्थान पर परवर्ती महापुरुष -गिरिधरी लाल साहिब (लखनवी), सूरस्वामीजी महाराज, दर्शन साहिब, मथुरादास साहब, संतोषदास और ध्यान दास, प्रकाश दासजी हुए। संत तुलसी साहब की समाध् हाथरस  में इनके स्थान पर बनी हुई है, जहाँ अभी प्रतिदिन मंदिर की तरह आरती-वंदना का काम वहाँ रहनेवाले विरक्त साधु और सज्जन लोग निभाया करते हैं।
    संत तुलसी साहब की कुछ रचनाएँ पद्य के रूप में पुस्तक में छपी हुई मिलती हैं। ये पद लोगों द्वारा बड़े ही श्रद्धा-भक्ति से गाये जाते हैं-
 :-गगन धर गंगा बहै:-
गगन धर गंगा  बहै, कहैं संत सुजाना हो ।।टेक।।


चढि़ सूरति सरवर गई, ससि सूर ठिकाना हो । 
बिरले गुरुमुख पाइया, जिन शब्द पिछाना हो ।।
सहँस कँवल दल पार में, मन बुद्धि हिराना हो । 
प्राण पुरुष आगे चले, सोइ करत बखाना हो ।।

विमल विमल बानी उठै, अदबुद असमाना हो । 
निर्मल वास निवास में, कर कर कोइ जाना हो ।।
तुलसी तलब तलबी करै, नित सुरति निसाना हो । 
अंड अलख लखिहैं सोई, चढि़ करि धरि ध्याना हो ।।
।। स्वर्ग पर करै खखार ।।
नर तन दुर्लभ देव को, सब कोइ कहत पुकार ।।
सब कोइ कहत पुकार, देव देही नहिं पावै । 
ऐसे मूरख लोग, स्वर्ग की आस लगावै ।।
पुन्य छीन सोइ देव, स्वर्ग से नरक में आवै । 
भरमै चारिउ खानि, पुन्य कहि ताहि रिझावै ।।
तुलसी सत मत तत गहै, स्वर्ग पर करै खखार । 
नर तन दुर्लभ देव को, सब कोइ कहत पुकार ।।
-: अजब अनार:-
अजब अनार दो बहिश्त के द्वार पै । 
लखै  दुरवेश  कोई  पफकीर प्यारा ।।
ऐनि के अध्र दो चश्म के बीच में । 
खसम को खोज जहाँ झलक तारा ।।
उसी बीच पफक्त खुद खुदा का तख्त है । 
सिश्त से देख  जहाँ  भिस्त  सारा ।।
तुलसी सत मत मुरशिद के हाथ है । 
मुरीद दिल रूह दोजख न्यारा ।।

-: बिना दीदार दुख भारी:-
पिया दरस बिना दीदार, दरद दुख भारी । 
बिन  सतगुरु  के  धृग,  जीवन  संसारी ।। टेक।।
कोइ भेटैं दीनदयाल, डगर बतलावैं । 
जेहि  घर  से  आया  जीव,  तहाँ  पहुँचावैं ।।
दरसन उनके उर माहिं, करैं बड़ भागी । 
तिनके तरने की नाव, किनारे लागी ।।

कहिं वे दाता मिल जायँ, करैं भव पारी । 
बिन  सतगुरु  के धृग,  जीवन  संसारी ।।
सत्संग करना मन तोड़, शरण संतन की । 
अन्दर अभिलाषा लगी, रहे चरनन की ।।
सूरत तन मन से साँच, रहै रस पीती । 
कोइ जावै सज्जन कुपफुर, काल को जीती ।।
अमृत  हरदम  कर  पान,  चुवै  चैधरी । 
बिन  सतगुरु  के  धृग,  जीवन  संसारी ।।
-: पिउ पिउ रटौ सुरति से:-
        पिउ पिउ रटौ सुरति से पपिया प्यारे ।।
स्वाति बूँद अध्र झरत, नार आस लखि अकाश ।
            पिउ की प्यास अमी  से बुझा रे ।
झिरिमिरि झिरिमिरि बरसत मेह, बीज बदर करि विदेह ।
                अज अदीद देह से निनारे ।
बने रे चै खलक खेल, पावै कोइ पलक सैल ।
            गुरु कै वचन कहत हौं पुकारे ।
सन्त सरन भये अधीन, बूझे कोइ  चरन चीन्ह ।
            सतसँग करि मरम कौ सिहारे।
तुलसी सब तरक कीन, सुँ दर में सबद लीन ।
            सुरत मुरति मगन होइ निहारे ।
    बाबा तुलसी साहब की रचना बड़ी बृहत् है। वह पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित है। गद्य और पद्य रूप में वह विभिन्न स्वरूप में बँटी हुई है। यहाँ पर थोड़े से नमूने को लिखा गया है। अस्तु!